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हिंदी-साहित्य का इतिहास

को लेकर मनु को ढूँढ़ती ढूँढ़ती वहाँ पहुँचती है। मनु उसे देखकर क्षोभ और पश्चात्ताप से भर जाते हैं। फिर उन सुंदर दिनों को याद करते हैं जब श्रद्धा के मिलने से उनका जीवन सुंदर और प्रफुल्ल हो गया था; जो जगत् पीड़ा और हलचल में व्यथित था वही विश्वास से पूर्ण, शांत, उज्जवल और मंगलमय बन गया था। मनु उससे चटपट अपने को वहाँ से निकाल ले चलने को कहते हैं। जब रात हुई तब मनु उठकर चुपचाप वहाँ से न जाने कहाँ चल दिए। उनके चले जाने पर श्रद्धा और इड़ा की बातचीत होती है और इड़ा अपनी बाँधी हुई अधिकार-व्यवस्था के इस भयंकर परिणाम को देख अपना साहस छूटने की बात कहती है-

श्रम-भाग वर्ग बन गया जिन्हें
अपने बल का है गर्व उन्हें।
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अधिकार न सीमा में रहते,
पावस-निर्झर से वे बहते।
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सब पिए मत्त लालसा-घूँट।
मेरा साहस अब गया छूट॥

इस पर श्रद्धा बोली-

वन विषम ध्वात


सिर चढ़ी रही, पाया न हृदय, तू विकल कर रही है अभिनय।
सुख-दुख की मधुमय धूप छाँह, तूने छोड़ी यह सरल राह।
चेतनता का, भौतिक विभाग-कर, जग को बाँट दिया विराग॥
चिति का स्वरूप यह नित्य जगत, यह रूप बदलता है शत शत,
कण विरह-मिलन-मय नृत्य निरत, उल्लासपूर्ण आनंद सतत॥

अंत में श्रद्धा अपने कुमार को इड़ा के हाथों में सौंप मनु को ढूँढ़ने निकली और उन्हें उसने सरस्वती-तट पर एक गुफा में पाया। मनु उस समय आँखें बंद किए चित् शक्ति का अंतर्नाद सुन रहे थे, ज्योतिर्मय पुरुष का आभास पा रहे थे, अखिल विश्व के बीच नटराज का नृत्य देख रहे थे। श्रद्धा को देखते