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पृष्ठ:हिंदुई साहित्य का इतिहास.pdf/१०२

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भूमिका

करने लगे जिनसे विषय संकीर्ण और जी उबा देने वाले हो गए।[] कुछ तो ऐसी प्रशंसा करने में कोई संकोच नहीं करते जो न केवल चापलूसी की, वरन् कुत्सित रुचि और उसी प्रकार बुद्धि की सीमा का उल्लंघन कर जाती है। अपने-अपने चरित-नायकों का चित्र प्रस्तुत करने के लिए दृश्यमान् अगत से ही इन कवियों की कल्पना को यथेष्ट बल नहीं मिलता, वे आध्यात्मिक जगत् में भी विचरण करने लगते हैं। इस प्रकार, उदाहरण थे लिए, उनके शाहंशाह की इच्छा पर प्रकृति की सब शक्तियाँ निर्भर रहती है। वही सूर्य और चन्द्र का मार्ग निर्धारित करती है। सब कुछ उनकी आशा के वशीभूत है। स्वयं भाग्य उनकी इच्छा का दास है।[]

मुसलमानी रचनाओं के छठे भाग में व्यंग्य आते हैं। दुनिया के सब देशों में आलोचक, व्यंग्य ने सब बाधाओं को पार कर प्रकाश पाया है। परीक्षा करना, तुलना करना, वास्तव में यह मानवी प्रकृति का अत्यन्त सुन्दर विशेषाधिकार है। अथवा क्योंकि मनुष्य के सब कार्य अपूर्णता पर


  1. गेटे (Goethe), Ost. West, Divan (पूर्वी पश्चिमी दीवान)
  2. वैसे भी क्लैसीकल लेखकों में ऐसी अतिशयोक्तियाँ पाई जाती हैं। क्या वर्जिल ने अपने 'Géorgiques' के प्रारंभ में सीज़र को देवताओं का स्वामी नहीं बताया? क्या उसने टेथिस (Téthys) की पुत्री को स्त्री रूप में नहीं दिया? क्या इस बात की इच्छा प्रकट नहीं की कि उसके सिंहासन को स्थान प्रदान करने के लिए स्कौरपियन (राशिचक्र का प्रतीक-अनु॰) का तारा-मडंल आदरपूर्वक मार्ग से हट जाय।
    मध्ययुगीन शृंगारी कवि (troubadours) इसी अतिशयोक्ति में डूबे हुए हैं; वे समस्त प्रकृति को अपनी नायिका की अनुचरी बना देते हैं और ल फ़ौतेन (la Fontaine) ने अपनी सरलता के साथ कभी-कभी चतुराई की बात कह दी है:—
    तीन प्रकार के व्यक्तियों की जितनी अधिक प्रशंसा की जाय थोड़ी है—अपना ईश्वर, अपनी प्रेयसी और अपना राजा।