लेखकों ने इस प्रकार की रचना का अभ्यास किया है, और गद्य और पद्य दोनों में ही रूपकालंकार के लिए अपनी अनियंत्रित रुचि प्रकट की है। मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं कि उसमें मौलिक, और विशेषतः उद्धृत पद्यों का बाहुल्य रहता है।
'क़सीदा'। इस कविता में, जिसमें प्रशंसा (मुदा), या व्यंग्य (इजो) रहता है, एक ही तुक में बारह से अधिक (सामान्यतः सौ) पंक्तियाँ रहती हैं, अपवाद स्वरूप पहली है, जिसके दो 'मिसरों' का तुक आपस में अवश्य मिलना चाहिए, और जिसे 'मुसर्रा' अर्थात्, तुक मिलने वाले दो 'मिसरे', और 'मतला' कहते हैं। अंत, जिसे 'मक़्ता' कहते हैं, में लेखक का उपनाम अवश्य आना चाहिए।
'क़िता', 'टुकड़ा', अर्थात् चार मिसरों, या दो पंक्तियों में रचित छन्द जिसके केवल अंतिम दो मिसरों की तुक मिलती है। पद्य मिश्रित गद्य-रचनाओं में प्रायः उनका प्रयोग होता है। 'क़िता' के एक छन्द को 'क़िताबन्द' कहते हैं।
'क़ौल' एक प्रकार का गीत, 'आइने अकबरी के अनुसार, जिसका व्यवहार विशेषतः दिल्ली में होता है।[१]
'ख़याल', विकृत रूप में 'ख़ियाल', और हिन्दुई में 'खियाल'।[२] हिन्दू और मुसलमान टेक बाली कुछ छोटी कविताओं को यह नाम देते हैं, जिनमें से अनेक लोकप्रिय गाने बन गई है, जिन्हें गिलक्राइस्ट ने अँगरेज़ी नाम 'Catch' दिया है। इन कविताओं का विषय प्रायः शृंगारात्मक, या कम-से-कम भावुकतापूर्ण रहता है। वे किसी स्त्री के मुँह से कहलाई जाती