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था। अन्त में नवाब के मरने पर सिराज ही बङ्गालका स्वाधीन नवाब हुआ। अलीवर्दी के समय हिन्दू और मुसलमान दोनों ही एक समान राज्य के ऊंचे पद पर नियुक्त किये गये थे। राजा जानकीरामका पहले ही उल्लेख हो चुका है। १७५३ ई० में उसकी मृत्यु के बाद उसके चारों लड़कों को अलीवर्दी से खिलअत मिली थी। उसका लड़का राजा दुर्लभराम सेनाविभागका प्रधान दीवान था। राजा रामनारायण पटने का नायब नाजिम था। रायरायां चिन्मय राय तथा आलमचांद के लड़के ऊंचे ऊंचे पद पर नियुक्त हुए थे।उच्च पदस्थ हिन्दू-कर्मचारी ही मनसबदार (सेनानायक) बनाये जाते थे। अलीवर्दी के ऐसे हिन्दू प्रेम के ही कारण हिन्दू-मुसलमान सेनानायक लोग अविचलित उत्साह से नवाबकी जय पताकाके नीचे डटे रहे। शत्रु लोग बाहर से आ कर कुछ अनिष्ट न कर सके। अलीवर्दीके गुण सिराज न थे अतएव इसका प्रभाव लोगों पर न पड़ सका। इसके बुरे आचरणसे अधिकांश सेनापति और प्रधान प्रधान हिन्दू कर्मचारी इससे विरक्त हो उठे। इस कारण पूरी सहायता औरसम्पत्ति रहते हुए भी इसकी राजलक्ष्मी कुछ ही दिनों में विमुख हो गई। पलासीकी लड़ाईसे इसके भाग्यने पलटा खाया तथा इङ्गलैण्ड के गोरोका भाग्योदय हुआ। सिराजउद्दाला और कम्पनी शब्दमें सविस्तार वर्णन देखो। मीरजाफर के नाममात्र को नवाबी पद पाने के बाद मीरकासिम कुछ समय तक पुराने गौरवको लौटाने की चेष्टा करता रहा, लेकिन उसका राज्य नष्ट हो गया और अन्तमें उसे संन्यास लेना पड़ा। मीरजाफर और मीरकासिम देखो। मीरकासिमके बाद बूढ़ा मीरजाफर अंगरेजाे की कठपुतलीकी तरह मुर्शिदाबादके सिंहासन पर कुछ दिन बैठा। १७६५ ई० में उसके मरने पर उसका लड़का उत्तराधिकारी हुए। उसके साथ भी अंगरेज लोगाे की नई सन्धि हुई। इस संधि के फलस्वरूप अंगरेजी कम्पनीने मानो शासनकार्य अपने हाथमें ले लिया। संधिमें यह भी निश्चित हुआ कि बड़ा लाट से परामर्श ले एक नायब नियुक्त करना होगा और बिना उनकी अनुमति के वह नायब हटाया नहीं जा सकता।
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१७६५ ई० में जब अयोध्याके वजीरने अंगरेजोंसे हार खा कर, कम्पनीको पूरी अधीनता स्वीकार कर ली, तब इलाहाबाद और कोराको छोड़ उसके सभी स्थान लौटा दिये गये। कम्पनीने बादशाहको ये दोनों स्थान दे, इसके बदलेमें बादशाही फरमानके अनुसार बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त की। उन दिनों नवाब बादशाहको प्रतिवर्ष २६ लाख रुपये उपहार भेजता था। अंगरेज लोगोंने उसे देनेका भी भार लिया तथा प्रति वर्ष वे निजामतके खर्च के लिये ५३८६१३१) रु० देने में भी सहमत हुए। १७६६ ई० में नजमउद्दौलाको मृत्यु हुई। पीछे उसका १६ वर्षका भाई सैफ उद्दौला नवाब हुआ। उसके साथ अंगरेज लोगोंकी एक सन्धि हुई और उसका वेतन घटा कर ४१८६१३१ रु० कर दिया गया। १७७० ई० में सैफउद्दौला चल बसा और उसका भाई मुबारकउद्दौला नवाब हुआ। उसके साथ भी एक सन्धि हुई तथा उसकी वृत्ति ३१८१६६१ रु० कर दी गई। मुर्शिदाबादके नवाबके साथ यही अन्तिम सन्धि है। इसके बाद 'सूबेदार' नाम रहने पर भी सारी शक्ति अंगरेज सरकारके हाथ आ गई। १७७२ ई० अंङ्गरेज सरकारने निजामतके खर्च के लिये अधिक रुं०को जरूरत न समझ केवल १२ लाख रु० निश्चित कर दिया। अभी तक यही वृत्ति निश्चित है। मुबारक उद्दौलाके बाद क्रमशः दिलवर जङ्ग, सैयद जैन उल आदुन खाँ (अली जा), सैयद अहमद अली खाँ (बाला जा), मुबारक अली खां (हुमायू जा) तथा उसका लड़का मनसूरअली खां मुर्शिदाबादका नवाब नाजिम हुआ मनसूर अली खॅाके समयमें १८७८ ई० में निजामतमे बड़ी गड़बड़ी मची जिससे नवाबको बहुत कर्ज हो गया। इसके पहले ही नवाबके हीरा जवाहिरात सरकारकी देखभालमें रक्खे गये थे। नवाबने उन्हें बेच कर अपने कर्ज चुकाने की प्रार्थना की। सरकारने एक कमीशन बैठाया। कमीशन ने विचार कर निर्णय किया, कि नवाब नाजिमको किसी प्रकार ऋण करने का अधिकार नहीं है। १८८० ई०को १ली नवम्बरको मनसूर अलीने नवाब |