पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१०५

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वांध

आनद्धवाद्य यंथामुरज, पटह, ढका, यिम्बक, कहते हैं। · कारण, पाद्यामापसे गान और नृत्य शोमा

दवाध, प्रणव, धन, सरा , लायजाह, नियल्य, करट, नहीं पाते। . . . कमंट, भेरी, कुड़की, हुड़का, मनस, मुरली, झली, · यह पाच फिर ताल के अधीन हैं, देताल याद्यादि दुकली, दौण्डिशाली, उमस, टमुको, मड्डू, कुण्डलो, लोगों के सुखदायक न हो कर केवल क्लेशप्रद होते हैं। तड गुनामा, रण, अभिधर, दुन्दुभी, रंज. डुड्की, दर्दुर वह ताल फिर विधात्मक अर्थात् · काल (क्षणादि), और उपाङ्ग प्रभृति आमद याद्य कहलाते हैं। | क्रिया ( तालकी घटना ), मान (दोनों क्रियाओं के मध्य विश्राम ) नामक तीन विभागोंके समाश्रय हैं। ताल - कांस्पताल भर्थात् करताल प्रभृतिको धन फहते हैं। शब्दसे व्युत्पत्तिगत गर्धसे इसकी सार्थकता प्रतिपन्न ... पुराणमें लिस्रो हुई घटनाका अवलम्बन करके संगीत- ‘होती है। प्रतिष्ठार्थक वाचक 'तल' धातुके बाद दामोदरकार लिखते हैं, कि रुचिमणी और . .सत्यतामा घण प्रत्यय द्वारा ताल शब्द निष्पन्न होता है। इससे प्रभृति श्रीकृष्णको आठ. पटरानियों के विवाहकालमें ये | बोध होता है, कि गान, वाध और नृत्य ये तीनों जिसके • चारों प्रकारके वाद्य एक साथ बनाये गये थे। इन चारों द्वारा प्रतिष्ठित होते हैं, उसे ही ताल कहते हैं। काल, प्रकार के वायके मध्य देवताओंके तत, गन्धवों के शुपिर, मार्ग (गति पथ) किया, मंग, ग्रह, जाति, कला, लय, राक्षसों के मानद्ध पर्व किन्नरोके धनवायाथे किन्तु भग- 'यति और प्रस्तार पे दशों तालके प्राणस्वरूप है। इन मान् श्रीकृष्ण पृथ्वी पर अवतार ले कर ये चारों प्रकारके पान इस मयंभुवनमें ले आये. ; तबसे थे याद्य पृथ्योमें दशों प्राणात्मक तालके जाननेवाले थ्यक्तिको ही संगीत- प्रयीण कह सकते हैं । शाल गानेवाले व्यक्तिको सांगीत प्रचलित हैं। ...: : ... . विषयमें मृत काहनेसे मी अत्युक्ति नहीं होती। जिस विष्णुमन्दरमें ये सब वाय बनानेसे विष्णु सन्तुष्ट हो तरह साधारण नौका विना कर्ण (पतयार) को सहायता. कर अभिमत फल प्रदान करते हैं। इसलिये विष्णुमन्दिर- में प्रातः भोर सध्याफे समय-इन सव-वाद्योंका बजाना के विपथके सिवाय कमो सुपथगामिनी नहीं हो सकतो उचित है। शास्त्र में जो विष्णुशद अभिहित ६, मह उसी तरह वे ताल गाना मानन्द प्रदान करने के बदले कर्ण: केवल उपलक्षण है। विष्णु शब्दसे सभी देवताओंका कटु ही होता है । .. र . .. शोध होता है। अतः सब. देवताओंके मन्दिरमें उसी तालके दश प्राणान्तर्गत 'काल' माला मामसे अमि. तरह पाजा बनाने की विधि है। ::- .::. . . . | हित होता है। इस माताके पांच भेद हैं, यथा-~-अणुदत, द्रुत, लघु, गुरु और प्लुत । इनके सांकेतिक नाम-गुद, द. शिवमन्दिरमें झलक ( कांस्य निर्मित करताल ) ल ग और प। इन्हें लिपिघद्ध करनेफे समय ०,६, सूर्यमन्दिर, शङ्ख दुर्गामन्दिरमें वंशी तथा माधुरी बजाना इस प्रकारसं लिखना होता है। एक सौ पनपत्र निषेध है एवं चिरनि मन्दिरमै ढोक और लक्ष्मोके । उपपरिभावसे रख कर सूई द्वारा गांधने में जितना मन्दिरम घण्टा नहीं बनाना चाहिये। यदि कोई वाद्यादि समय लगता है, उसे क्षण कहने हैं। एक क्षण, रणु: करने असमर्थ हो, तो वे घण्टा बजा सकते हैं, कारण द्रुत या णुद, दो क्षणमें द्रुत याद, दो द्रुतमें (चार घण्टा संथ यायोका स्वरूप बतलाया गया है । क्षणमें ) लघु या ल , दो लघु (आठ क्षण) गुरु घा याच सङ्गीतका एक प्रधान अङ्ग है। गीत, वाद्य | ग पयं तीन लघुर्म विरह क्षण में ) प्लुन या प होगा। गौर नृत्य इन तीनों के एकल समाधेशको ही संगीत किसी किसी संगोतम पंडितने पात्र लघु वर्गों के उया. कहते हैं। कुछ लोग गीत और वाद्य इन दोनों संयोग- रण-समयको एक लघुमात्रा बतलाया है एवं तदनुसार ही को हो संगीत कइ गपे हैं। उनके मतानुसार गीत और दाणुद तादिमाता काल निदिए किया है। ..: घाध हो. प्रधान है, नृत्य इन दोनोंका अनुगामो है। इन सब माताओं के विभिन्न प्रकारके विन्यासस कोई कोई तो गान, याच गीर नृत्य प्रत्येकको हो संगोत । बहुसंख्यक तालों को उत्पत्ति हुई है। उनमें फतिपय vot, xxI 24