पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/११

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यासन, विषय, छाद, वास । (शब्दरत्ना०) धर्मशास्त्रकार | हो हलका होगा उतना ही अच्छा है। शीतातनिवारणमें भृगुने पत्रको परिधानयिधिके सम्बन्धमें कहा है, कि शुक्लवन न तो शुभद है और न उष्ण ही है । ऐसा विकक्ष अर्थात् काछ लगाये विना, उत्तरीयहीन, आधा | वस्त्र वर्या में व्यवहार करना होता है। मनुष्यको मैला नंगा या बिलकुल नंगा हो कर कोई श्रोत वा स्मारी कर्म कपड़ा कभी न पहनना चाहिये। इससे फण्डू और कृमि . न करना चाहिये।... उत्पन्न होते हैं तथा यह ग्लानिकर और लक्ष्मीभाग्य- .. परिधानफे बाहर यदि काछ लगा रहे, तो वह आसुरी.हर है। . . प्रथा हो जाती है, इस कारण सम्पूर्ण संमृनकच्छ होना स्वप्नयोगों वस्त्रादि दर्शन एकान्त शुभप्रद है.। कन्या, हो उचित है। "परीधानाद्वहिः कक्षा .निवन्धा ह्यासुरी - शुकवख परिधायी गौर वर्ण चंचल छोटे छोटे लड़केको, भवेत् ।" (स्मृति) धौधायनके मतसे वाई ओर, पृष्ठ छल, दर्पण, विष और आमिय तथा शुलवर्णके पुष्प, वस्त्र और नामि इन तीन स्थानों में तीन कक्ष हैं, इन तीन कक्षों-1 और अपवित्र मालेपनको स्वप्नमें देखनेसे आयु आरोग्य को ठीक करके जो ब्राह्मण वस्त्र पहनते हैं, ये शुचि होते | तथा बहुवित्त लाभ होता है। (वाभट शरीरस्थान ६ म०) नववस्त्र शास्त्रानुसार दिन देख कर पहनना होता • प्रचेताका कहना है. कि जो वन नाभिदेशमें पहननेसे है। अशास्त्रीय दिनमें पहननेसे अशुभ होता है। ज्योति. दोनों घुटने तक लटकता है, उसका नाम अन्तरोय है। स्तत्त्वमें लिखा है कि अपने जन्मनक्षत्रमे और अनुराधा, - यह यस्त्र उत्तम है। यह अच्छिन्न होना आवश्यक है। । विशाला, हस्ता, चित्रा मादि कुछ विहित नक्षत्रों में तशा , स्मृतिशास्त्रमें लिखा है, "दशा नाभी प्रयोजयेत् । पदम्पति, शुक्र और पुध दिनमें या किसी उत्सवमें नया मन्यात् कर्मणि कञ्चुकीति । उत्तरीयधारण चोपयोतवत्" | वस्त्र पहनना चाहिये। (ज्योतिस्तत्त्व) . अर्थात् दशा वा वस्त्रका प्रान्तभाग नाभिदेशमें खोस दे। . दिन न देख पर जिस किसी दिनमें नया वस्त्र पहनने- कञ्चुकी हो कर अर्थात् किसी प्रकारका संगरखा पहन | से नाना प्रकारका गमङ्गल होता है, विहित दिनमें नया . कर कोई विहित कर्म न फरे, कर्मकालीन उपयोतयत्। वस्त्र पहननेसे उसका विपरीत फल अर्थात् मङ्गललाम पवित्र उत्तरीय धारण करे। . • अपश्यम्भावी है। कर्मलोचनमें लिया है, कि रविवारको पूर्वोक्त भृगुफे वर्णनानुसार मालूम होता है, कि नया वस्त्र पहननेसे अल्प धन, सोमवारको प्रण तथा सभीको दो दो वस्त्र अर्थात् परिधेय और उत्तरीय धारण मङ्गलयारको नाना फ्लेश होता है। फिर विहित दिनमें करना चाहिये। अर्थात् बुध, वृहस्पति और शुक्रवारमें ना वस्त्र पहननेसे ____घनधारणके गुण-निर्गल वस्त्र पहननेसे कामो | यथाक्रम प्रभूत वन लाभ, विद्या और वित्त समागम तथा हीपन, प्रशंसालाभ, दीर्घायु, अलक्ष्मीनाश तथा आत्म | नाना प्रकारका भोगसुख, प्रमोद.और शय्पालाम होता है। प्रसाद होता है। इससे शरीरको शोभा बढ़ती और इन्हें छोड़ कर शनिवारको नवयस्न कदापि न पहनना • पहननेवाला सभ्यसमाजमें जाने लायक होता है। वाहिये, पहननेसे रोग, शोक और कलह हमेशा हुमा ___ मनानफे बाद कपड़े ले शरीरको अच्छी तर मलना • चाहिये । इससे देहको कान्ति खुलती है तथा देहके . मलिन पत्रको क्षारसे परिष्कार करना उचित है। अनेक कण्डदोप जाते रहते हैं। सभी प्रकारका कौपेय फिर यह क्षार भो दिन कुदिन देख कर काममें लाना घम्त्र अर्थात् पट्टयस्त्र या सर-वस्त अथवा चित्र-' होता है। क्योंकि निपिद्ध: दिन क्षार मिलानेसे वस्त्र - यन. और रकपन शीतकालमें पहनना उचित है। स्यामोके सात कुल दग्ध हो जाते हैं । वस्त्रमें क्षार

पयोंकि इससे वात और श्लेष्मकाप प्रशमित होता मिलानेके निषिद्ध दिन ये सब हैं, शनि और मङ्गल, षष्ठो

है । . पवित्र सुशीतकापाय- वस्त्र पित्तहर है, इसलिये | और द्वादशी तथा श्राद्धदिन। ___ . उसे ग्रीष्मकालमें पहना उनित है। यह यस्त्र जितना । वराहमिहिरको वृहत्संहिनामें लिखा है, कि.वस्त्र Vol. xxI 3