पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/११३

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वाद्ययन्त्र १०१ मन्दिर बनाया था। थियनगरंके संगीतज्ञ पण्डित इम- ! जैसे-करतालादि । इन चारों प्रकारके वाद्ययन्नों में 'तत' मोनियसके फ्लुटनिर्माण में लगभग ६ हजार रुपये खर्च यन्त्र हो सर्वश्रेष्ठ है और बहुत संख्या विभक्त है। इसका · हुए थे। स्वर बड़ा हो सुमधुर होता है, किन्तु इसके बजानेमें बहुत रोमन लोगोंने प्रोकोंसे जिस तरह शिला-विज्ञानादिको । परिश्रम करना पड़ता है। पहले "तत" और इसके शिक्षा प्राप्त की थी, संगीत-सम्बन्ध में भी वे र.नानियों के बाद अयनद्धादि यन्त्रोंके विषय यथाक्रमसे वर्णन किये वैसे हो ऋणी थे। रोममें जयढाक, सिगा प्रभृतिका भो । जाते हैं। पूरा प्रचार था। रोमन संगीतज्ञ भिद्रभियसके प्रथमें ततयन्त्र। जलतरंग वाजे का उल्लेख है । लेखकने उस प्रन्यमें गरिए ____ मालापिनी, ब्रह्मयीणा, किन्नरी, विपञ्ची, बल्लरी, कम नामक हारमोनियमका भी उल्लेख किया है। ज्येष्ठा, चित्रा, घोषवतो, जया, हस्तिका, कर्मिका, कुटजा, ___ प्रनीच्य देशमें ख.धीय दशयीं या ग्यारहवीं शताब्दो | सारङ्गी, परिवादिनी, विस्वरो, श्वेनतंत्री, नकुलोष्ठी, ठंसरी, पर्यन्त वाद्ययन्त्रको सविशेष उन्नतिका उल्लेग देखा। मोडम्यरी, पिनाक, निवंग, पुष्कल, गदा, यारणहस्त, रुद्र नहीं जाता। वर्तमान मारगन (Organ) यूनानियोंके | घोणा, स्वरमंडल, कपिनास, मधुस्यन्दी, घना, महतीयोणा, जलतरंग वा हाईड्रोनिकन यन्त्रका विकाशमात्र है। रञ्जनी, शारदी या सारद, सुग्माग्द या सुरसो, स्वर- यह भारगन (Organ) राष्टीय दशवीं शताब्दी में भी शृङ्गार, सुरवहार, नादेश्वर वीणा, भरत घीणा, तुम्वुरु ईसाइयोंके गिर्जाघरमें यजाये जाते थे, किन्तु उस समय घीणा, कात्यायन वीणा, प्रसारणो, इसराज, मायूरी वा उमको पनावट वर्तमान आरगनकी तरह सुन्दर न थी । तायूश, मलावू सारङ्गी, मोन सारङ्गो, सारिन्दा, परतंत्री ये सब याद्ययन्त्र धीरे धीरे किस तरह समवेत वा एकतारा, गोपीयन्त्र, मानन्दलहरी और मोचन संगीतके भिन्न भिन्न अड्के पूरक हए थे, यह याद्य. इत्यादि यन्त्र "तत" कहलाते हैं। संस्कृत संगोत-मान्य सङ्गीतको आलोचना किये बिना अच्छी तरह समझने कितनेके तो सिर्फ नाम और कितनेके आकार आदिका - नहीं आ सकता। सङ्गीत देखो। भी वर्णन है। उन सय यन्त्रोंके आकारादि क्रमश: यहां ___गान, वाद्य और नृत्य-इन तीनोंको ही सङ्गीत कहने | वर्णन किये जाते हैं। हैं। इनमें वाध हो एक प्रधान अङ्ग है। किन्तु यह वाद्य पिनाका फिर यन्त्रके अधीन है। इस कारण भारतीय सङ्गीत पिनाकके आकारादिको देखने से मालूम पड़ता है, कि शाखसे लेकर यहां कितने ही विषयों का उल्लेख किया मनुष्यको प्रथमावस्थामें संगीतकी प्रवृत्ति बलयती होने जाता है। वाद्ययन्त्र प्रधानतः "तत", "अपनद्ध" वा | पर सर्वप्रथम पिनाकको ही सृष्टि हुई, इसके बाद मानव "भानद्ध", "शुविर" और "घन", इन चार भागोंमें विभक्त, जातिको सभ्यताको वृद्धिके गनुसार भिन्न भिन्न आकार- है। जो सब वाद्ययन्त्र तन्त्र अर्थात् पीतल और लोहे के ततयन्त्रोंका आविष्कार हुआ होगा। पिनाक देखने में घने तार अथवा तन्तु (तात )के सहयोगसे बजाये ठीक ज्या-युक्त धनुपके समान होता है। दाहिने हायकी जाते हैं, उन्हें "तत" यन्त्र कहते हैं, जैसे-वीणादि । अंगुली द्वारा इमको तांतमे आघात करके यह यन्त्र । जिन सब घाद्ययन्त्रों के मुव चर्मावनद्ध अर्थात चमड़ेसे | वजा जाता है। यांगे हाथके अल्पाधिक दयावके कौशल आच्छादित रहते हैं, वे 'भान' यन्त्र कहलाते हैं, जैसे- से इससे ऊँचा मोचा स्वर निकाला जाता है। मृदंगादि। जो यन्त्र वास, काठ धातुओंके बने होते हैं एकतंत्री या एकतारा। एवं जो मुखले फूक कर बजाये जाते हैं, उन्हें । | एक छोटे कद का तृतीयांश बाट फर बकरेके चमडे "शुपिर" यन्त्र कहते हैं, जैसे-वंशी आदि । जो गय यन्त्र द्वारा उस कटे हुए मुखको आच्छादित करना होता है कांसे प्रभृति धातुओंसे बनाये जाते हैं एवं जिनसे .एवं उसमें सात भाउ मंगुल परिधियाला तथा डेढ़ हाथ - यायमें नाल दिया जाता है, उनका नाम "धन" यन्त्र है,| लम्या एक सका हएडा उस कह के बण्डेसे संयोजित . Vol. XXI. 26,