पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/११५

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घाधयन्त्र कमी वा कच्छपी पीया। . . , .. सप्तकका कोमल निषाद, एकसे मध्य सप्तकका तीन कच्छपीवीणाका खोल कच्छपपृष्ठकी तरह चिपटे कद मध्यम स्वर पाया जाता है, अन्यान्य विकृत स्वरको ' द्वारा बना रहता है । इसलिये उसे कच्छपो वीणा कहते | आवश्यकता होने पर उन उन सारिकाओं को इंडेके हैं। इस पोणाकी लम्बाई सर्वत्र हो प्रायः चार फोरको | ऊर्वाधाभावमे उठा कर तथा झुका कर कोमल और तीन होती है ; किन्तु कोई कोई इसकी लम्बाईमें ज्यादा कमी | कर लेना पड़ता है। कच्छपी वीणा धजानेके समय भो कर दिया करते हैं। आकारमें कुछ बड़ी होनेसे | यन्त्र के पिछले हिस्सेको वादक अपने सामने रख कर रागका भालाप एवं छोटी होनेसे गत् बजानेमें अधिक तुम्येको घगलको दाहिने हाथके कब्जेसे अच्छी तरह दवा सुविधा होती है। कच्छपीकी लम्बाई चार फीट होने कर एवं उडेको वाये हाथ द्वारा हलफेसे पकड़े रहता है। पर उसकी पन्थीसे प्रायः सात अगुल ऊपर तन्तासन, इसके बाद दाहिने हाथको तर्जनी द्वारा ततासन एवं • एवं प्रायः साढ़े तीन फीट ऊपर तन्तु स्थापन करनेको सारिकाओंके मध्यस्थ शून्य स्थानमें आघात करने पर विधि है। परिमाणमें चार फीटको कमी पेशी होनेसे बांये हाथको तज्जनी तथा मध्यमांगुली द्वारा जिस समय उसीफे अनुसार तन्वासन एवं तन्तु स्थापन करना जिस स्वरकी आवश्यकता होती है उस समय उस होता है। मालूम पड़ता है, प्राचीनकालमें कच्छपी | सारिकाके ऊपरका तार दवा कर धैसा स्वर निकाला घोणा में सिर्फ तीन तार लगाये जाते थे, इसी कारण | जाता है। कच्छपो वीणाने भी कालचक्र तथा देशभेदसे कच्छपी.वीणा सेतार चा सितारके नाम भी विख्यात | नाम और भाकार धारण कर लिया है। है। पारस्य भाषामें 'से' शब्दसे तोन संख्याका बोध होता | त्रिस्वरी वा प्रितन्त्रों वीया। है, सुतरा - सतार वा सितार शब्दसे तीन तारविशिष्ट वितन्त्रोके अङ्ग प्रत्यादि प्राय: कच्छपोके समान यन्त्रका धोध होता है। किन्तु इस समय कच्छपीमें | हो होते हैं, विशेषता इतनी ही है, कि इसका खोल कह का तारको जगह पांच या सात तार लगाये जाते है। न हो कर काठका बना रहता है। इसमें सिर्फ तीन तार कच्छपीमें जो पांच तार लगे रहते हैं, उनमें दो तो लोह व्यवहत होते हैं। उन तीनों नारों में एक लोहेका निर्मित पके एवं तीन पीतल निर्मित कच्चे. तार रहते। पक्का और पीतलके दो कच्चे तार रहते हैं। लोहे तार है। लौहनिर्मिन दो तारों के मध्य एकको मन्द्रसप्तक. को नायको अर्थात् प्रधान तार कहते हैं, उसे मध्यसप्तक के मध्यम और दुसरेको उसका हो पञ्चम फरफे बांधना के बीच में बांधना होता है । पीतल के तारों के मध्य एकको होता है। पोतलके बने हुए तीन तारों के मध्य दो तारों ) मन्द्रसप्तकका पड़ज एवं दूसरेको मन्द्रसप्तकके निम्नसप्तक- को मन्द्रसप्तक पहज पचं एकको मन्द्रसप्तकफे निम्न का पञ्चम करको बांधना होता है । नितन्त्रों में भी कच्छपी- सप्तकका पड़ज करके बाँधनेको रोति है। सात तार की तरह सत्रह सारिकाएं रहती ई एवं उनके द्वारा हो विशिष्ट कच्छपी में चार लोहे और तीन पोतल के तार| दाई सप्तक स्वर निष्पन्न होते हैं। इसके धारण तथा रहते हैं, उनमें लोहेके दो पर्व पोतलको तीन तारों को बनाने को प्रणाली कच्छपीफे समान है। पूर्वोक्त नियमसे बाँध कर लोदनिर्मित शेष दो सामिसे | - किन्नरी यीणा। एकको मध्यसप्तकका-पड़ज दुसरेको उस सप्तका | प्राचीन समयमें किन्नरोका खोल नारियलको माला पञ्चम करके बांधना होता है। इन दोनों तारोंको विकारों से बनाया जाता था, किन्तु इस समय उसके बदले पृहदा. कहते हैं। कच्छपोके मुंडे के ऊपर स्वरस्थानमें सतह कार पक्षियोंफ डिम्व या चांदो प्रभृति धातुओंसे तैयार लोहादि कठिन धातु निर्मित सारिकाएं तात द्वारा किया जाता है, किन्तु इस स्वर में किसी तरहका अन्तर दृढ़तासे बंधी रहती हैं, उनके द्वारा मन्द्रसप्तकके पहजसे नहीं भाता। किन्नरी सिर्फ पांच तार व्यवहार किये तार सप्तक मध्यम पर्यान्त ये दाई सप्तक स्वर सम्पन्न जाते हैं। पांचौतारों में कच्छपीके जो जो तार जिस गिस ' होते हैं। उक सतरह सारिकामों के मध्य एकसं मन्द्र सरमें आवद्ध करनेको विधि है, इसके तार भी उन्हीं .