पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१२१

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वाद्ययन्त्र १०७ पञ्चम और दो मध्यसप्तकके पहनों यांधे जाते हैं। बायें हाथसे पकड़ते हैं। इसके बाद दाहिने ..... . . सारङ्गी । हायसे धनुहो पकड़ कर संचालन करते हुए इसकी पावन • सारङ्गी अति प्राचीन यन्त्र है। कहते है, कि लङ्काके / क्रिया निष्पन्न करते हैं। इसको सारिकामोंके ऊपर राजा रावणने पहले पहल इसको सृष्टि की थी। यह बांये हाथको तर्जनी और मध्यमांगुली सञ्चालन करके यन्त बहुत प्राचीन समयसे हो अवित नाम और भाकार प्रयोजनानुसार सभी प्रकारके स्वर निकाले ज्ञात हैं। से भारतवर्षमें चला भा रहा है ; कितु दूसरे दूसरे | इस यन्त्रका नायकी तार ही प्रधानतः वजाया जाता है देशोंमें यह यन्त कारादिमें कुछ अदल बदल कर भिन्न | और दूसरे दूसरे तार खरसयोजनके लिये व्यवहत मिन्न नामसे विख्यात हो गया है। इस यन्क्षके खोल होते हैं । यह यन्त्र भी प्रायः सारङ्गीकी तरह स्त्रियों और उडे एक ही लकड़ोके दने होते हैं। इसका गान माधुर्य्य-सम्पादनके लिये हो ध्ययहत होता है। खेोल चमड़े द्वारा और डडा पतले काटफलक द्वारा मढ़े कभी कभी यह स्वतंत्रभावसे भी बनाया जाता है। यद रहते हैं। उडेके दोनों पार्श्वमें दो दो करके चार खूटियां भी एक आधुनिक यन्त्र है। मायूरी। . रहती हैं। उन खूटियों में चार शांत बंधी रहती हैं। इंडे की बगल में कई एक अप्रधान तारकी खूटियां रहती हैं। । विशेष विवेचना कर देखनेसे मायूरी कोई स्वतन्त्र पूर्वोक्त चार तांतों से एक मन्द्रसप्तकके पड़त, एक पञ्चम | - यन्त्र नहीं कहा जा सकता; इसरार यन्त्रगे खोपड़े के दो मध्यसप्तकके पड़ज फरके वांधे जाते हैं। इसमें | मुख पर एक काठका बना मयूरका मुख लगा देनेसे ही मायूरोयन्त्र बन जाता है । इसके आकारादि तथा चादन- सारिकामों का व्यवहार नहीं होता । यह यन्त्र अगुल्यादिक किया, इसरारके समान ही होती है। द्वारा बजाया नहीं जाता, वरन् अश्वपुच्छवद्ध एक धनुहोसे | अलावूसारंगी। बजाया जाता है। धनुहोके संचालनके साथ साथ अलावूमारंगी सारंगीका ही एक अंग है। इन ततुओं में बांये हाधको कनिष्ठादि चार उंगलियो- दोनों में अन्तर यह है, कि सारगी लकड़ीके एक टुकड़े से के अगले भागसे संघर्पण करके स्वर निकाले जाते हैं। बनाया जाता है और इसका पिछला भाग काठका न इस यत्रको मधुर ध्वनि कोमलकराठी स्त्रियों के स्वरके | होकर एक दीर्घाकार कह का बना होता है। इसी अनुरूप होती है। यदि एक घरमें यह यन्त्र पज्ञाया जाय कारण इसे अलावूसारंगी कहते हैं । पश्चायती और पासके दूसरे घरों कोई सुकाठो स्त्री गान करे, तो मलायूके अतिरिक्त अन्यान्य अंग प्रत्यंग फाठके धने गति स्वरक्ष व्यक्ति भी दोनों के स्वरकी पृथक्ता जल्दी भनु रहते हैं। इसकी प्रधान तांत, प्रधान तार, स्वरबन्ध. भय नहीं कर सकते। नादि सय फुछ सारगोके समान ही होते हैं। सिर्फ इसरार- पादन-प्रणाली में कुछ अन्तर देख पड़ता है। सारगोको इसरारका समूचा अंग एक हो काष्ठमण्डका बना | जिस तरह गोदमें सरलभायसे बड़ा फरफे यजाना होता है। इसका खोल प्रायः सारङ्गीके खोलके समान पड़ता है, इसे उस रूपमें खड़ा करके पकड़ना नहीं और उडा सितारक डेके समान रहता है। पांच तार परता: वरम् इसको पन्योकी ओरसे इसे कन्धे पर वाले सितारके तार जिस धातुके बने होते हैं पर्व स्थापन कर एवं बांये हाधकी हथेली और अंगूठे द्वारा जिस स्वरमें बंधे रहते हैं, इसरारक पांचों तार भी उसी | पकड़ कर अन्यान्य गलियों के अप्रभाग इसकी तंतुओंफे धातुके वो होते है तथा उसी स्वरमें बंधे रहते हैं। ऊपर संचालन करके स्वर निकालना पड़ता है। मूल अन्तर सिर्फ इतना ही है, कि इसमें वादक इच्छानुसार बात यह है, कि अलावूसारंगो आधुनिक येहलोकी रीति- पीतलके कई एक समधान तार लगे रहते हैं। उन अप्र से बजाई जाती है। धान सारों का सार वन्धन भी वादक इच्छाधीन रहता । मौनसारंगी। . . है। धादक इसयन्त्रको सरल भावसे खड़ा करके एवं इसराज और मोनसारंगी एक हो यन्त्र) है, अन्तर .