पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१२५

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वाधयन्त्र इसका छाया हुआ चमड़ा सूतको डोरी या चमड़े को | बन्दर नचानेवालोंका धाजा यन रहा है। इसके दोनों डोरीसे फसा जाता है। सौन्दर्य बढ़ाने के लिये इस बाजे मुंह चौड़े होते हैं और योचर्म पतला रहता है। यह पक्षियोंके पर जोड़े जाते हैं। रस्सोमें पांघ कर लोग | मूठमें पकड़ कर बजाया जाता है। इसको छवाई भी इसे बनाते हैं। दोनों हाधर्मि लकड़ी ले कर उनसे ही चमड़े को होती है और चमड़े को डेरीस इसके दामों धनाया जाता है। इसके साथ छोटे नकारेका भी व्यवहार भोरके चमड़े कसे रहते हैं । चमड़े को डोरीमें एक 'होता है। उत्सयों, विशेषतः मुसलमानी पर्यों में इसका शीशेकी गोला बंधी रहती है। डमरूको हिलाने डुलानेसे अत्यधिक व्यवहार होता है। . यह वजता है। यह बाजा बड़ा विमोहक है । इस वाजे पर - तासा। भी लोगोंका अधिक ध्यान आकर्षित होता था। तासा देखने में उपयुक्त जगझपको तरह है । विशेषता खुरदक। यह है, कि छाजनीका चमड़ा कुछ अपेक्षाकृत मोटा होता | खुरदकके दोनों मेखडे छोटे नकारेके समान होते हैं। है। यह जगमापके साथ पजता है। इसके बजानेका | ये मेखड़े मिट्टीके बने होते हैं। इनमें सिर्फ एरुका मुख कायदा जगझपकी तरह हो है । विवाहादि उत्सोंमें | कुछ अधिक चौड़ा होता है। इन दोनों मेखड़े फे मुवी अधिक व्यवहन होता है। इस प्रकार कौशलसे चमड़े मढ़े जाते हैं, कि एकसे उच्च नौयत। और दूसरेसे नादस्वर निकलता है। जिससे नादस्पर ।' इसका आकार नमारकी तरह होता है। केवल निकलता है, उसके चाड़े मसालेका रहता है। यह वजनमें कुछ कम होता और यह पतले चमड़े से छाया दोनों हाथोंके आघातसे बनाया जाता है। इसे रोशन- रहता है। दरवाजे पर नकारेकी तरह दोनों हाथोंसे छोटी | चौकीके साथ बजाते हैं। छोटो लकडियोंसे बजाया जाता है। शुपिरयन्त्र। . .. दमामा । जी सब यन्त्र छिद्रयुक्त होते हैं, उन्हें शुपिरयन्त्र - नौवतकी तरह ही इसका भाकार और नौवतके, कहते हैं। यह यन्त्र मुखसे फूक मार कर वजाया जाता ' उपकरणों से हो यह तय्यार होता है। विशेषता यह है, है। वंशी, पार, पायिका, मूरली, मधुकारी, कादला, कि नीयत वाजेको अपेक्षा इसका मुन्न चौड़ा और इसका सिंगा, रणसिंगा, रामसिंगा, शङ्ख, मुदी, बुक्का, स्वर- चमड़ा कुछ मोरा होता है। दमामा भी नौयंतके साथ नाभि, गलापिक, चर्मवंशो, सजलवंशी, रोशनचौको, ही बजता है। दमामा पहले युद्ध के याजी शामिल था। शहनाई, कलम, सुरही, मेरो, गोमुखी, तुबड़ी तथा येणु . . जोड़घाई ।' . प्रभृति यन्त्र शुपिरयन्त्र के अन्दर गिने जाते हैं। बड़े जोडघाई और कुछ गद्दों पक ढोलके ऊपर दूसरा दुःखका विषय है, कि इनके अधिकांशको नाम हो पाये छोटा ढोल जोड़ा रहता है। इससे छोटे ढोलसे उच्च | गपे हैं, साकारादिका कोई चिह्न भी परिलक्षित नहीं भौर बहे दोलसे निम्न स्वर निकलता है। जय जैसे होता । शुपिरयन्त प्रधानतः वंशी, काहल, सिंगा और स्वर निकालनेको आवश्यकता होती है, तब वैसे हो शङ्ख, इन चार जातियोंन विभक है। ढोल पर भाघात किया जाता है। यह बाजा पहले प्रायः | वशी। बङ्गाली देखा जाता था। अब उसका प्रचार बहुत कम यह यन्त्र पहले गोलाकार, सरल एवं गांउहीन घांस. हो गया है। या यों कहिये, कि अब इस बाजेता लोप हो का ही बनाया जाता था; इसीलिये इसका नाम घंशो __. हा गया है। . • 'पड़ा। मनुष्यकी सभ्यता पृद्धिके साथ साथ सैर, डमरू। चन्दनादि काष्ठ। सुवणे प्रभृति धातु भौर हाथोंके दांत- ., दमक बहुत पुराना बाजा है। देवदेव महादेव इसको से भी यह चित्र तैयार होने लगा है। किन्तु इसके नाम में । बजाते थे। किन्तु इस समय तो सपेरे या मालु या कुछ परिवर्तन नहीं हुआ है। मंत्री मध्यका छिद्र - - -