पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


वस्त्र चान्द्रायणग्रत है। चान्द्रायण करनेसे हो यह व्यकि| रह कर मूर्ख और काधन हो कर समय व्यतीत करना - उक पाप वा अपराधसे मुक्त हो सकता है। होगा। किन्तु इस अपराधसे मुक्ति पानेका प्रायश्चित्त - इस प्रकार रक वस्त्र पहन कर भो विष्णुपूजादि है। प्रायश्चित्त करते जानेमें विष्णुमें अटल भक्ति हो, करना निषिद्ध है। उक्त घराहपुराणमें दूसरी जगह लिखा | थोड़ा भोजन करे। माघ मासके शुक्लपक्षीय द्वादशीके है, कि रत पल पहन कर विष्णुपूजा करनेसे रजस्वला दिन क्षान्त, दान्त और जितेन्द्रिय भावसे आनन्यमनसे स्त्रियोंके जो रक्त मोक्षण होता है उस रक्तसे लिप्ताङ्ग हो विष्णुध्यानमें मग्न हो जलाशय पर अवस्थान करे । पीछे कर उक पूजकको पन्द्रह वर्ष तक नरकम वास करना जय रात पीत जाय और सूर्य उदय हो, तव पञ्चगव्य खा पड़ेगा। इस अपराघ-शोधनका प्रायश्चित्त है--सत्तरह | कर अधिरात् सर्व किल्विषसे मुक्त होंगे। दिन पकाहार, तीन दिन बायुभक्षण तथा एक दिन जला दशान्वित वन पहनने की हो विधि है। दशाहीन हार। वस्त्र अवैध है, यह धर्म-कर्ममें उपयुक्त नहीं होता। काला वस्त्र पहन पर भी विष्णुपूजादि नहीं करनी वस्त्रविशेष प्रतिग्रह करने पर उसका प्रायश्चित्त करना चाहिये। करनेसे पूजकको पहले पांच वर्ष तक घून हो। पड़ता है। हारीत कहते हैं, कि "मणिवासोपवादीनां कर जन्म लेना पड़ेगा, पोछे कोई काष्ठभक्षक कोट, उसके | प्रतिग्रहे सावित्राटशतं जपेत् ।" 'अष्टसहस्र अष्टोत्तरसहस्र- पाद चौदह वर्ष तक गारांयत योनिका भोग करना होगा। मिति'। (शुद्धितत्त्व ) इस जन्म में उक्त व्यक्तिको सित पारावत हो कर किसो कालिफापुराणमें लिखा है-कपास, कम्बल, वहाल प्रतिष्ठित विष्णुविग्रहके पास हो यास करना पड़ेगा। मौर कौपेयज, ये सव वस्त्र देवोहे शसे समन्त्रक पूजा इस अपराधका प्रायश्चित्त है सात दिन तक याचक भक्षण करके उत्सर्ग करेंगे। किन्तु जो वस्त्र दशाहीन, मलिन, तथा तीन रात सिर्फ तीन शक्तुपिण्ड भोजन। इस जीर्ण, छिन्न, परकीय, मूपिकदर, सूचीविद्ध, ष्यवाहत, केश- • प्रकार प्रायश्चित्त करने होसे उसके पाप दूर होंगे। युत, अधीत किंवा श्लेष्मा तथा मूत्रादि द्वारा दूपित हो, ___ अधीत वस्त्र पहन कर विष्णुपूजादि करना मना है। पैसा चख देवोद्देशमें किया देव वा पेत्रा कर्म उपलक्ष इसमें भो अपराध है। अपराधोको उन्मत्त हाथो, ऊँट, | दान करना उचित नहीं। प्रत्युत ये सव वक्ष इन सव गदहे, गोदड़, घोड़े, सारङ्ग और मृगयोनिमें जन्म लेना स्थानों में यर्जन करना हो कर्तब्य है। पड़ता है। इस प्रकार सात जम्मके याद अन्तमें मनुष्य ___ उक्त पुराणमें दूसरी जगह लिखा है-उत्तरीय, उत्तरा. पोनि लाभ होनेसे वह विष्णुभक्त और गुणज्ञ होगा। संग, निचोल, मोदचेलक और परिधान नामक पञ्चविध 'इसोसे उसका अपराध जाता रहेगा। किन्तु इस जन्ममें | घस्न विना सिलाई किये हुए व्यवहार वा दान करने की हो इस प्रकार अपराध माचनका प्रायश्चित्त है। भक्ति विधि है, किन्तु शनसूवनिर्मित घन, नोशार (मसहरी), युक्त हो कर उसका अनुष्ठान करना पड़ेगा। इसका सातपल, चंडातक (स्त्रियोंको चोलोके कपड़े ) एवं दूष्य प्रायश्चित है तीन दिन यापक भोजन और तीन दिन गर्थात् यत्रगृह, ये सप कपड़े सिलाई किये जाने पर भी पिण्याक भोजन। इसके सिवा तीन दिन कणमक्ष हो । दूषित नहीं होते। कर तथा तीन दिन पायंस सा कर विताना होगा। प्रायः | इसके अतिरिक पताका और ध्वजादिमें सिलाई श्चित्त द्वारा पापक्षय होने हीसे मुकिका पथ उन्मुक हो | किपे हुए कपड़े हो आवश्यक है। जायगा। । भिन्न भिन्न देवताओं की पूजाफे कपड़े भिन्न भिन्न .. दूसरेका वस्त्र पहन कर भी विष्णुको पूजा गादि । होते हैं। किस देवताको कोन पत्र देना होता है, उसके महीं करनी चाहिए। फरनेसे अपराधी होना पड़ता है। सम्बन्ध कालिकापुराणमें इस तरह लिखा है- इसना दोपयों इस अपराधके फलसे इकोस वर्ष तक मृग- रक्तवर्ण कौपेय पत्र महादेवीको देना प्रास्तई, पोनिका भोग करना होता है । पीछे एक जन्म लंगड़ा इसी तरह पीतयण कोषेय वस्त्र वासुदेव को, लाल कम्पल