पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१३५

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वाद्ययन्त्र ११५ . क्षुद्रपिटका या घुघरू। पर दो दो पटतालियां रख कर उगलीसे बजाने हैं। इसका घुघरू पीतलका बना होता है । इसका आकार छोटा । वजाना बहुत कठिन है, इस कारण इसके बजानेवाले घकुल जैसा, पर खोखला हेाता है। भीतरमें बहुत छोटो। वहुत कम मिलते हैं। ऐक्यतान-यादनके साथ इसका सीस की गोली रहती है। कुछ घुघुरुओंको एक साथ | वाद्य सुन्दर मालूम होता है। रस्सी यांध कर पायी पहनना होता है। चलते वा - रामकरताप्ती । नाच करते समय उससे एक प्रकारकी अस्फुट ध्यान परतालीसे कुछ बड़े यन्त्रको राम करताली कहने निरलतो है। हैं। इसके वादन आदि अन्यान्य विषय करतालीके . . . समान होते हैं। . . . . . . नूपुर । नूपुर कांसेका बना होता है । इसको बनावट कुछ टेढो | - सप्तमराव या जलतरङ्ग । होती है, देखने में यह बहुत कुछ पाजेयके जैसा लगता | यह यन्त्र प्रथम सृष्टिकालमें कांस्यादि धातु अथवा है। इसके भीतर भी घुघरूको तरह छोटी छोरी सोमेको एक एक पजादि सप्तस्यरविशिष्ट और अनुरणात्मक गोलियां रहती हैं। यह प्रायः ताण्डवनत्य में ही प्रल पदार्थक बने हुए सात सराव वा ढकनसे बनाया जाता था, इस कारण इसे सप्तप्राय कहते थे। पीछे जय हृत होता है। . . उसके बदले चीनी मिट्टीफे सात कटोरेमें आवश्यकता- मन्दिरा या मजीरा कांसे को बनी हुई छोटी छोटी कटो. नुसार जल डाल कर सात स्वर मिला लेने की प्रथा रियों को जोड़ी है। उनके मध्यमे छेद होता है। इन्हीं आविष्कृत हुई, - भोसे यह सप्तसराय नामके बदले में जल- छेदमि डेरा पहना कर उसकी सहायतासे एक कटोरीसे ताङ्ग कहलाने लगा है। अभी सात कटारेका व्यवहार न . दूसरी पर चोट दे कर सङ्गीत के साथ ताल देते हैं । यह ! हो कर जिससे ढाई सप्तक स्वर पाये जायं उतने ही यत्र मृदङ्ग, तवला और ढोलक आदि आनद्ध बाजोंके 1.फटोरेका यावहार देखने में आता है। यह यन्त बजाने के साथ ताल देनेके लिये व्यवहत होता है। इसका दूसरा | समय वादक उन क्टोरोंको अर्द्धचन्द्राकारमे मना कर नाम जोड़ी भी है। रस्वते हैं और दोनों हाथोंसे दे। छोटे मुद्गर, दएड पा . । लकड़ोके आघात द्वारा उन कटोरोंको यजाते हैं। इसमें . . . . करताली। . पद्मपत्न सदृशं गोलाकार कांसेका बना हुआ पतला इच्छानुसार गतादि धजाये जाते हैं, इस कारण यह समतल यात्र करनाली कहलाता है । यह एक तरह की दो काय स्वतःसिद्ध यन्त्रमें गिना गया है। इसका करताली होती है। सफा मध्यभाग कुछ उठा होता है। | वाद्य सुनने में बहुत मधुर होता है, किन्तु विना अभ्यासके ..इसके बीच में छेद रहता है, उस छेदमें रस्सी धंधी होती वज्ञानेसे यह श्रवणमधुर न है। कर प्रयणकटु होता है। ... है। ,.रस्सोको गली में लपेट कर दोनों करताली दोनों इसके सिवा भारतवर्ष में और भी अनेक प्रकारके .: हाथी बजाई जाती हैं। यह यत्र .आनयंत्रके साथ वाद्ययन्त्रोंका प्रचलन देखा जाता है। इन यन्त्रों में कोई ___ व्ययहत होता है। प्राचीन दे यवोंके संपागमे, कोई वैदेशिक यंत्र विशेषफे अनुकरण पर और कोई प्राचीन और आधुनिक हो या . .. पटतानी। .. के संमिश्रणमे उगम हुआ है। पटनालीको हिन्दीमें बटतालो और बङ्गालामें वर-. शिलाविज्ञान की उन्नति के साथ साथ यूरोपापण्ड में अनेक तालो कहते हैं। यह कठिन लीह (इस्पात ) से धनाई प्रकार वाद्ययतोंको भी उत्पत्ति हुई है तथा उस नये जाती।इसकी लम्बाई माध मिलन है, देह हुन मेटो समाती उनका संस्कार र उति होती नहीं, पीठ गोल और पेट समतल, मध्यस्थरसे दोनों तल, मध्यस्थलस याना | जा रही है। यहां उन सब यत्रोंका विशेष परिचय ओरका अप्रभाग क्रमशः सूक्ष्म होता है।.. यजाने समय न दे कर पचल कुछ यदि नाम और उनसे इतिहास चार परतालियां एक साथ व्यवहत होती है। दोनों हथेली दिये जाते है-, : .:. . .