पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१५१

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.;. वामनः . १३७ तुम निकट भविष्यमें धीम्रप्ट हो जामोगे।" गुरु शुका. . . . :इस समय वामनदेवने यलिसे कहा, फिमने मुझ- चार्यके शापसे भी बलि विचलित न हुए और अपने | -को.तीन पैर-भूमि दान को है, दो पैरमें यह सब कुछ हो - सत्यधर्म पर अटल रहे। इसके बाद उन्होंने धामनको | -गया। अब तीसरे पैरके लिये भूमि कहां है, दो। इस भूमिदानका सङ्कल्प पढ़ा। यजमान बलिने घामनदेयके | समय मैंने तुम्हारे सब विषयों पर आक्रमण कर लिया। चरणाको धो कर उस जलको शिर पर धारण किया । | -फिर तुम अपने स्वीकृत यायको पूरा न कर सके। मत- इस समय वर्ग के देवता इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर एव तुमको इस पापसे नरकमे जाना होगा। अतः तुम पुष्प-टि करने लगे। - " .. .. . . शुकाचार्यकी माझा ले कर नरकका रास्ता पकड़ो। "देखते देखते वामनदेवका शरीर आश्चर्यरूपसे बढ़ · भगवानके इस वाक्य पर लिने कहा, मैंने जो 'गर। गुणत्रय इसी. रूपके अन्तर्गत. थे। अतएव | कुछ कहा है, उसे झूठ कभी न होने दूंगा। आप अपने पृथ्यो, आकाश, दिक् स्वर्ग: वियर, समुद्र, पशु, पक्षी, | तीसरे पैरको मेरे मस्तक पर घर दें। भगयानने वलिको नर' गौर देवतागण सभी इसी रूपमें अधिष्ठित थे। इस तरहसे निग्रह कर उसको यांध दिया। वलिकी यह वलिगे देखा, कि विश्वमूर्ति हरिके चरणों के नीचे रसा | दुर्दशा देख प्रहाद आ कर भगवान्की स्तुति करने लगे। · तल, दोनों चरणों में पृथ्वी, जङ्घायुगल में पर्वतश्रेणो, पलिको पत्नी विन्ध्यावलि पतिको घंधा हुआ देख पुर 'घुटने में पक्षिगण और ऊरुदयमें मरगण, यसममें संध्या, फर कहने लगो-मगयन् | मापने वलिका सपस्य हरण "गुह्य में प्रजापति, नितम्बम आप और असुरगण, नाभि- कर लिया। अव इनको पाशमुक कीजिये, पलि निगृहीत देशर्म आकाश, कोख में सातो समुद्र, वक्षस्थल पर सभी होनेके उपयुक्त नहीं। यलिने अकातरभायसे भापको तारे, हदयमें धर्म, स्तनद्वयमें अंत और सत्य, मनमें | समूनी पृथ्यो दान कर दी है। अपने वाइवलंसे जिन सद "चन्द्र और पक्षास्थलमै कमला विराज रही है, यह देख लोकोंको जीता था, उन सबको आपके हवाले किया । जो राजा बलि स्तम्मित हुए। . .. - सामान्य पुरुष हैं, घे भी आपको चरण-पूजा कर उत्तमा - टस समय भगवान् वामनने एक पैरसे पृथ्यो, शरोर | गति लाभ करते हैं और वलिने तो मापके चरणों में अपना से आकाश और वाहु द्वारा दिङ्मएडल पर आक्रमण सर्वस्व अर्पण कर दिया। इनकी ऐसी दशा न हानी 'किया। इसके बाद उन्होंने दूसरा पैर फैलाया, इस पैर- चाहिये । इसलिये आप इनको मुक्त करें। में स्वर्ग जरा भर ही हुमा। जितु तीसरे पैरफे लिये अप भगयानने वलि-पतोसे कहा-मैं जिस पर दया कुछ न बचा। दूसरे चरणने हो क्रमसे जनलोक, तपा- दिखाता है, उसका अर्थ छोनता है। क्योंकि अर्थसे हो लोक आदि लोकों पर आक्रमण कर सत्यलोक पर ममताको उत्पत्ति होती है। इसी ममताफे कारण मानयो प्रभुत्य जमाया। देवताओंने उनका यह मयङ्कर रूप. और मेरो अयशा होती है। जीयात्मा अपने कर्मके कारण देख कर उनकी स्तुति करनी प्रारम्भ की। .. . .पराधीन हो कर मिकोट मादि योनियोंका परिभ्रमण . फमसे विष्णुने अपने विस्तारको घोरे धीरे कम कर र अन्तमें मानययानि पाती है। उस समय यदि दिया और फिर अपना पूर्य रूप धारण किया । यसुरों- जन्म, कर्म, यौयन, रूप, विद्या, ऐश्वर्य या धन आदिसे ने पामनके इस कृत्यको मायाजाल समझ कर महायुद्ध गर्थित नहीं होता तो उसके प्रति मेरो दया हुई है, ऐसा फरनेका आयोजन किया। शितु राजा बलिने उनसे समझना होगा । जो मेरे भक्त है, ये धन सब वस्तुओं मना कर कहा, कि तुम लोग युद्ध न करो, शान्त हो। द्वारा यिमुग्ध नहीं होते। इम दैत्यश्रेष्ठ कीर्तिवर्द्धन पलि. समय हम लोगों के लिये अच्छा नहीं है। कालो अनि ने दुर्जया मायाको जीत लिया है और फप्ट पा कर भी क्रम करनेमें काई समर्थ नहीं हुआ है। बलिको पात सुन यह मुग्ध नहीं हुमा, यित्तहीन हुमा हे, स्थानम्रए हो कर कर दैत्य विष्णुफे पार्षद भयसे रसातल में घुम जाने : वांधा गया है, शन द्वारा बांधा गया है, जाति द्वारा पा तैयार हुए। . . , . :". परित्यक मौर गुर द्वारा तिरस्कृत मौर ममिशप्त - Vol, XXI, 35,