पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१५३

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१३६ वामनतत्व-वामनमुक्त यामनतरव-एक तत्वप्रग्य: .. : द्विजातियोंको भोजन करावे, पीछे बन्धुवांधयों के साथ घमिनदत्त सम्वितप्रकाशके प्रणेता। • आप भोजन करे । घामनपुराण और भविष्योत्तरपुराणमें वामनदेव-एक कषि। वामन देखो.. . | इस व्रतविधिका वर्णन है।. . वामनद्वादशी (सं० स्त्री० ) वामनदेवताक' द्वादशीग्रत ब्रह्मवैवर्तपुराणमे लिखा है, कि द्वादशीको दिन बहुत .विशेष । वामनद्वादशीमत देखो।... . . . . . . सरे नदीसङ्गम पर जाकर संक्ला करना होगा। उनको धामनद्वादशोपंत (सं० लो०) घामनदेवताकं टादशीयतं ।। पीछे एक माशा सोनेसे या शक्तिपः भनुसार याममदेषकी श्रवणाद्वादशीम कथं वामनदेयका प्रतविशेष। द्वादशो- मूर्ति बनानी चाहिये । उस मूर्तिको कुम्भ ऊपर सुपर्ण- के दिन यामनदेयके उद्देशसे यंदवत करना होता है, इस पात्र में रख कर पोछे स्नान करा उसकी पूजा करे । कारण इसको चामनद्वादशीव्रत कहते हैं। हरिभक्तिः । अर्घ्य देने के बाद ब्राह्मणको छन, पादुका, गो गौर 'चिलीसमें इस व्रतका विधान इस प्रकार लिखा है कमण्डलु दान करना होता है। रातिकाल में नृत्य- ..श्रयणाद्वादशोके पहले एकादशी के दिन निरम्य उप गीतादि द्वारा रात्रिमागरण करना उचित है। द्वादशीमें 'घोसो रद कर यह व्रत करना होता है। भाद्रमासकी प्राह्मणको भोजन करा कर आप पारण करे। द्वादशोक "शुक्ला द्वादशीको श्रवणा द्वादशी कहते हैं। अतएव रहते ही पारण करना उचित है। पायपरिवर्तन एकादशीमें उपवासी रह कर यह व्रत जो विधिपूर्वक इस प्रतका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें "करना उचित है। द्वादशीके क्षय होने पर एकादशीको | सभी प्रकारका सुख-सौभाग्य प्राप्त होता है। जो पिता- 'रातकी या दूसरे दिन' द्वादशीको वामनदेवको पूजा करे। माताके उद्देशसे यह प्रतफल अर्पण करते हैं, ये कुलसाती सोना, चांदी, तांदा या वांसइनसे विसो एकका पात्र | हो कर पितृऋणसे उत्तीर्ण होते हैं। इस प्रतफे करने- बना कर ताम्रकुण्ड स्थापन करे तथा वाई पगल छतरी, : -याले हरिधाममें जा कर ७७ .युग यास करते हैं और खा, बांसको अच्छी छड़ो, 'क्षसूत्र और कुश पीछे इस पृथ्वी पर जन्म ले कर राजा होते हैं। . . 'रखना होता है। गन्ध, पुष्प, फल, धूप, नाना प्रकारफे | ___ . . . . . (हरिभक्तिवि० १५ विक्ष) “नवेधे, भोक्षमोज्य और गुडोदन आदि द्वारा यामनदेवको वामनपुराण ( स० क्लो० ) शटादश पुराणोमिसे. एक 'पूजा करनी होती है। मृत्य-गीतादि द्वारा रात्रिजागरण | पुराण । पुराण शब्द देखो। . . . “करना आवश्यक है। पहले वामनदेवको अर्घ्य दे कर पीछे घामनभट्ट-निम्बार्कसम्प्रदायके एक गुरु। ये रामचन्द्र पूजा करना होती है. इस मर्यमें कुछ विशेषता है, यह भट्टके शिष्य और कृष्णभट्टके गुरु थे। ...... यह कि सफेद मारियल के पानीसे मध्यं देवे। . यामनभट्ट- रत्नाकर और शब्दरत्ना भर नामक अभि- - इसके बाद दोनों पादमें मत्स्यकी; दोनों जानु में | धानके प्रणेता.1..यह..बत्त्यगोत्रीय क्रोटि एज्याके पुत्र फूर्मकी, गुह्यमें वराहकी नाभिमैं, नृसिंहकी, यक्षास्थलमें .और.वरदाग्निवित्तके पौत्र थे।..',,.--... - : यामनको दोनों कश्में परशुरामकी, दोनों भुजाओंमें राम- यामनभवाण-घुनाथचरित्र . और ङ्गारभूषण नामक की, मस्तक कृष्ण की और सोनमें युद्ध तथा फल्लोको माणफे प्रणेता। ...:: :, अर्चना करनी चाहिपे "ओ मत्स्याय ममः पादयोः" घामनपत्ति (सं० स्त्रो०) यामनचितः काशिकासि | इत्यादि कमसे पूजा करनी होगी। इसके बाद "को घाममप्रत (स. छो०) यामनदेयता धनम् । वामन सभ्यो आयुधेभ्यो नमः" कह कर समो आयुधको पूजा द्वादशीयत । " . : ' : 1 करनी चाहिये । पीछे विधानानुसार मन पर कर भाचा यामनसिंहरजमणिदेव-दाक्षिणात्यफे एक राजा . मौर द्विजगणको दान देना आवश्यक है । उन्हें भी | यामनसिंहराज-एक · हिन्दूराज। आप दाक्षिणात्यम उक्त द्रव्य मन्त्र पढ़कर प्रहण करना उचित है। . " राश्य करते थे। ... इसके बाद प्रतकारी यघियुक्त पुतःपरोस कर पहले . पामतसूक्त र सलो०) दिकस्तोसमे