पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१६०

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.. " वायु "शब्दतन्मात्रयहितात् स्पर्शसन्मात्रा बागुः--शब्दस्पर्शगुणेः।" , होने से शीतजना होती है तशा होत्पादक सामग्रियों को . इत्यादि। | विभक्त कर भिन्न भिन्न भाकार, यथायोग्य स्थान पर - माग्यकारिका- पहुँचती है, इस कारण तीन दोषों में घायुको हो प्रधान ":सामान्यकरणमृतिप्राणायाः पापयः पञ्च ।" २६ र हा है। पफाशेय, कटो, 'समिय, स्रोत, भस्पिं गौर इस एतने माप गौड़गायमुगिने पश्चयायुके क्रिपा- स्पशेन्द्रिय हैं, उनमें से पकाश प्रधान स्थान है। समय संक्षेपतः बहुमप्रकाशक भोक पाते. काही हैं। परमात्र घायु पित्तको तरद नामभेद, स्थानमे पुराणमें लिया, जियायु ४६ है। ये समी गरितिक मौर कियाभेइसे पांच प्रकारकी है। जैसे दाग, ग्राम, पुष है दने इन देवत्व प्रदान किया। यह वायुदेव- समान, मपान और पान स्थान गौर कियाभेदसे को पाहा और मन्तभदसे दस प्रकारको है। जैसे-माण, एक ही पाय उन सब पृषा शा गामोसे पुकारी गो. अपान, ध्यान, समान, उदान, नाग, कूर्ग, शकर, देवदत्त है। कण्ठे, दृश्य, अग्नाशय, मलाशय और समस्त शरीर और धनअप। इन दस प्रकारको वायुफे कार्य पृथा। इन पांच स्थानोम यथाफम उदांग, माण, समान, जपान पृथया है। जैसे, प्राणयायुका कार्य-पहिर्गगन, गपान- | भोर ध्यान ये पांच यायु रहती है। जो वायु श्यास का कार्म-अधोगगन, प्यानका कार्यभापुञ्चन गोर प्रश्वास के समय ऊर्ध्वगामी होती है और गर्थात् शरीरसे प्रसारण, समानका कार्म-असित पोसादिका समता. | निकलती है, उसे उदानवायु कहते हैं। आनयापु पारा मयन, उदानका कर्म-दुनियन । ये पाव यायु यायाधन और सङ्गीत मादि मिया-निर्याह होतो गान्तर है अर्थात् पे शरीरफ भीतरमें काम करती हैं। है! इसको विकृति होने दो से दर्म रोग उत्पन्न मागादिपाव वायु या अर्थात् शरीरफ बाहरी भागमे होता है। फा करती है। जिस किया द्वारा उद्गार कार्य सम्पन्न घास-प्रश्वासफे समय जो वायु देहम प्रवेश करती है उस घायुको नाम माग है। इसी प्रकार उम्मीलनकारो। है उसका नाम मायायु है। इस योयुजारा . पायुका माम फूर्ग, क्षुधाकर घायुका नाम एकर, जमाण | यस्तु पेटमें घुसतो है, यह जीयनरक्षाका प्रधान कारण करका नाम देयदस्त तथा मर्यव्यापी यायुका नाम धन- है। किन्तु इस यायुफ दूषित होनेसे प्रायः दिका (हिंघको) अय है। ( मागवत ) मत्त शब्दमें पौराणिक विवरण देस।।। भोर भ्यास मादि रोग हुगा करते है। ., , . माया लिया है-पायु, पित्त गौर कफ ये | ___ जो यायु भामाशय मोर पकाशयमें विपरण.करती सोग दोप हैं। इनके विकृत होनेसे देह नष्ट होती है। है उसका नाम समानयायु है। यह समानपायु मनिके मपिएन अपस्यामै रहने से शरीर सुस्थ रहता है। साथ संयुक-दो कर उदस्थित .मानको परिपाक करतो ___पायुका म्यरूप यथा-यायु मन्यान्य दोप, पातु मौर ६ तथा मानके परिपाक होमेसे सो रस मोर मसादि मल आदिक परेक है पर इन्हें दूसरी जगह भेगरी | अपग्न होता है उसे.पृथक करतो.है। किन्तु यह समान. ६। फिर पर माशुकारो, रजोगुणात्मक, सूक्ष्म, सक्षम, पायु यदि दूषित-दो, तो इससे मन्दाग्नि, मतिसार. मौर शोसगुणयुना, लघु और गमनमोल मोहै। अन्यान्य गुल्म गादि रोग उत्पन्न होते है। चार प्राय लियायित घायु द्वारा उस्माह, ___मपानयायु पाशपमें ६ र यथासमय पायु.. ' याम, प्रयास, चेटा (कापियापार), ग, प्रति मल, मूत्र, शुक मोर मायको नोचे ठेलता है स. पातु' माराग्नियोंकी पटुमा सपा हाप, इस्ट्रिय गौर मानवायुफ दूषित होनेसे बस्ति मोर गुहादेश धित पिwधारप ये माकपा मण्यो सरह सम्मायन होती मामा प्रकारले फठिग. राग, शुकराप भीर प्रमेह तथा . है। मह जोगुणात्मक, रश्म, गोरगुणात्मक,RY, ध्यान गर गपायायुफै गुपित हामो समगो. मनमोल, ग, म, योगयाही मार संपोक हरा सरो ६५ सा प होते है। . BREmisr से मार सोम साप सं सदेहयारी पानपायु मारा रसपास और