पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१६१

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वायु २४७ तिम्रायनामम, उपक्षेपण उत्ोषण, निमेष गौर उन्मेप, “उहाल, सोया और तिनी घायल, मंग, मसूर, अरहर पे पांच:प्रकारकी चेष्टा में निर्वाहित होती हैं। ... और शिम आदि पदार्थ याना, उपयास, विपमाशन, गरीरधारियों को प्रायः; मभी क्रियाये व्यायायुसे अमीर्ण रदने भोजन, घर्षामृतु, मेघागमहाल, मुक्ताग्नका सम्बन्ध रखती हैं अर्थात् प्राय: सभी क्रिया ध्यानवायु परिपाककाल, अपराहकाल तथा घायुप्रयाहका समय पे सम्पक्ष होती इस पायकी प्रस्यन्दन, उदहन. | सभी यायु प्रापर्क कारण है। ' पूरण निरेचन और धारण ये पांच प्रकारको क्रियायें हैं। घृततैलादि स्नेहपान, स्वेप्रयोग, डोल्पवमन, इसके गिरने का विरेधन, अनुयासन, मधुर, अम्ल, लघण और उपाय उक्त पांच प्रकारको न्यायुके एकत्र कुपित होनेसे शरीर | "भोजन, तेलाम्पङ्ग घरबादि द्वारा घेप्टन, 'मयप्रदर्शन, निश्वप हो विनष्ट होता है। । । दशमूल काथादिका प्रसेक, पैष्टिक और गौद्धिक मद्यपान कायुका कार्य-सभी भाशयम आमाशय श्लेष्माका, परिपुए मांसका रसभोजन तथा सुरव स्वच्छन्दता मादिद कारणों से वायुको शारित होती है। .. :: पित्ताशय पित्तका; और पिक्वाशय घायुका अयस्थिति.. | "पायुका गुण- मत्परत : रक्षताजनक, पिय- धान है। ये तीन दोष गरीरमें सर्यन और सदा र्णताजनक मोर स्तम्धताकारक; दाद पित्त, स्वेद, मूर्छा उपस्थित रहने हैं। इन तीन दोषों में यायुःशरीरके सभी और पिपामानाशक है, अप्रयाप्त अर्थात् 'पायुशून्य स्थान धातुओं और मलादि पदार्थो को चालित करती है तथा इसका विपरीन गुणयुक्त है। 'सुखजनकयायु अर्थात् मन्द पायु द्वारा हो उत्साह, श्वास, प्रश्वास, धेष्टर, वेग मादि • और इन्द्रियों के कार्य सम्पादित होते हैं। यायु स्वभावतः मन्द शीतल घायु नोमकालसे शरत्काल तक सेयनीय है। परमाय और आरोग्यके लिये संदा यायशून्य मायक्ष, सूक्ष्म, शीतल, लघु, गतिशील, माशुकारी, खर, मृदु स्थानमें रहना चाहिये। . . समीरयोगवाही है। सन्धिम्रश अङ्गमत्यादिका विक्षेप,

: पूर्वदिशाको वाय-गुण, उष्ण, स्निग्ध, रक्तदूपक,

__ मुदगरादि आघात या मूलकी तरह अथवा सूचीवैधकी , " विदाही भोर यायुपद्धक, श्रान्त और क्षीणकाध्यक्तिके मातरविदारणको तरह मथयारज्जु द्वारा बन्धनको तरह लिपतिजनक खाद मर्यात भक्ष्यद्रष्यों की मधुरतापक पदनामस्पर्शाक्षता, अङ्गको अपसनता, 'मलमूत्रादिका कालयणरस, अभिष्यन्दी तथा स्वग दोप, अर्श, पि, कमि, निर्गम और शोषण, अमन शिरादिकापसाच, मनिपात प्रवर, श्वास और भामयातजनक है। रोमाञ्चकम्परिकर्फशता, अस्थिरता, सछिद्रना, रसादिका "दक्षिण दिशाकी वायु-स्वादिष्ट, रक्तपित्तनाशफ घु, शोषण, रुपन्दनास्ताम, वाय-स्वाद तथा स्याय या अक्षण- म: शीतयोर्ग, बलकारक, चक्ष के लिये हितकर, पहें याय पर्णता, सर यायुफे कार्य है। शरीरमें याथुके बिगड़ने- शरीरको यायकोवढानेवाली नहीं है।... गले पेसा लक्षण दिखाई देते हैं। ...' पश्चिम दिशाको घायु-तीक्ष्ण, शोधक, पलकारक, .. वायुप्रकोप भीर शान्तिः घायु क्यों बिगड़ती है और लय पायपद्धक तथा मेद पित्त और कफनाशक है। किस उपायसे घायुका प्रकोप शान्त होता है, इसका उत्तर दिशाको याय-शीतल, स्निग्ध, व्याधिपोहितों विषय प्रक: प्रत्यापों लिखा है,--पलधान् जीयके साथ सी.त्रिदोयप्रकोपका समक, सुस्थ, व्यक्तिके लिये बल. मल्लयुस अतिरित व्यायाम, मधिकांमैथुन, अत्यन्त मध्य कारक, मधुर और मृत्योर्ग है। . . . • पनाने स्थाRसे गिरना, गोसे चिलमा, पोड़न या ......अग्निकोणको मायु-दाजनक और राक्ष नसत. माघातमाप्ति, सांधमारता,रातको जागना, बोट दाना, कोणको, याय अयिदादी, यायकोणको, पाय, तिक्तरस, मणापरमा यो कोमपारो पर बहुत दूर तक जाना: शानकोणको ,याय सहरसा विश्वग्याय.मात्.सर्ग- मलमूत्र मधेयायु, शुक्र पनि, उदार, हिला और आंसूका म्यान यायपरमायके लिये अहितकर तथा प्राणियोंक रेग रोकना, कर्मा, तीता कसैला, असा हल्का और लिये रोजाना। इसलिये विश्यग्यायका सेवन न करना दार्य याबासासूचा:मांजोरी, कोदो, चाहिये, करनेसे स्यास्थ्यको हानि होता है.:..::