पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१६२

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वायु "पंपेको याप-दाद, स्यद, मच्छो भीर धान्तिनाथे पोहोन, परपोतर, शोध कोपनस्वाय, मोर, ६. वाट पगेको याय लिदोपनाशक, वांसके पंचेको | उनको पिपिटका परको भोर पिचो रहती है। कुक्षा, पायु का मौररत-पित्तप्रकोषक, चामर, पस्त, मयूर | पार, उंट, गृधिनी, धुहिया, कौमी भी उन मी और 'यसके की चाय विदोषनाशक, स्निग्ध और थानातिक होती हैं। (भाव... . . . . . हदपप्राही है। जितने प्रकारके रखे हैं उनमें पदो पखे . - घरफ, मुथुत मादि प्रायमें भो वायुका यिशेरपसे भले माने गपे है। गुण वर्णन किया गया है । यिपर बढ़ जाने के कारण सर्पथ्यापी, माशुकारो, यलपान्, गल्पकोपन, स्वातम्य उनका उल्लेख नहीं किया गया। : . ..... . तथा बहुरोगपद पे सप गुण पाय , इस कारण पाय पायुके सम्बन्धमें दार्शनिक विचार । .. .. .. :: . समो दोपोस प्रबल है। पापविशतिका लक्षण-यात. निरुक्तिका कारमा है-"यायत्तियती स्पानि प्रतिक मनुष्य जागरणशोल, अल्फेशयिनिए दस्त । कर्मणः।" नियक्तिमापकार कहते है-"तममी पौर पद स्फुरित, एश..तगामी, अत्यन्त वाफ्यध्यपी, याति गच्छति।" इसके द्वारा मालूम होतो. को रूस तथा स्वप्नायस्थामै माकाशमें घूम रहा है, ऐसा मालूम होता है। . . . . संतत गतिशील, यहोवायुफे नामसे प्रसिद्ध है। यामरका पहना, हिपातप्रति मनुष्य प्रायः हो ... उपनिषदमें जगतां की मालोचमा में पायुका विष दोपारमक अर्थात् दोपयुक्त होने है। उनके पेश और हाथ भालोचित मा है। तत्तिरोय उपमिपहफे प्रमानवपातो. पैर फटे और कुछ कुछ पाण्तुपर्णके दो जाते हैं। यात. । मे लिखा है- . . . . . . . . . :', प्रकृति के गनुप शीतदेपो, प ति , घश्चन स्मरण गकि. "तस्माता पतस्मादात्मन माशा समुदभूता" (मंदया. घनयुद्ध, यसरि, चञ्चल गति और चचल कार्य. गन्दयो १३) मर्यात् ३न अमात 'परमारमासे मूर्ति विशिष्ट देते हैं। ऐसे मनुष्य किसो शक्तिका भो | मान पदार्थ में भयकाशस्परूप सब नाम का निर्वाहक विश्वास नहीं करते, मन सदा सन्दिग्ध रगता है। ये शम्द गुणपूर्णमाको उत्पत्ति हुई है। .... नमक यापप-प्रयोग किया करते हैं। पे थोड़े धनी, सो आकाशसे यायुको उदातिहा है। जहां किरा ला:सन्ता, मला कफ, लपायु और अतर गिट्टा | यहां दो गति । ( lotion ) है, कि शिया विशिष्ट होते हैं । गा यापय क्षीण गौर गद्दा पंसद हेतु कम्पन (Vibration') उत्पन्न होता। परयक मोर टूटा होता है अर्थात् कएट से निकालने कामको प्रतिरूप गति। गतिहेतु स्पर्श हैयह समय पाप टूट फूट कर मिलते हैं। ये प्राया मनात : सम्पचा पदार्थ, सहिए हो कर भी शाद मौर मास्तिा , पिलासपर, महोत, दास्य, मृगया और पर्श पूर्ण है। इसमें शोर मौर:पशं दोनों दी। पqni लालमायिन दरो.है। मधुर, मन और जो मात्र ( Space ) : यह हो मानमत्तांकियां. लयण रसमिनिट मार उरणय भोजन को प्रिय है।) अगितं शम्न भार स्पर्श है। इससे धुनि "कहा- घे दुपले पाले मोर लम्बे होने हैं। इसके गलने वैरका "माया ... .... " म मट देहाना है। किसी विपमे की दता नहीं • इस यातका ऐसा तात्पर्य नहीं कियायनी (Notion) रानी मौरमितेभियोग पनि गति पहले गगी। पर पासपी शाही सतो.fr. सपा करने योग्य नहीं जायेगोरगतिम"यह किम कारण पदार्थ मोर माणसमगुरपायक हसार नदो वरने गोल वर मा पारंग है। ममी मध्यन सत्य होगामि mal को गोलाकार परमार सरद दिला नाही दोहका शिकांश दाग समmar नियमतितारमामा भी है और होमपा.योगायत्री "qrtunt पर भौर पर.रोहण करो मति पगं संका है। Rafi . . . गोपनिमेमो पदासात हुन।