पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१६४

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पायु-वायुगोप देवनारयमे साटिन होता है, यही येदका पाय देवता है। मगि माकाशमें ही प्रतिष्ठित है। दोपभ तिमें .धतिने कहा है- . . . . . लिखा है- . "वायुमेको भयन परिप्य रूप रूप पतिको यभूव । । सोणिया इमानि मतान्याहातादेश समुत्पान्ति मार परस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूप रुम पनिस्पो पदिय " पत्यन्त पन्ताकाशे पैम्पो व्यापनाकामः परामयम् ।": (कट १०) । माकान हो से सब भूगोंकी उत्पत्ति में अर्थात् जिस तरह एक दो घायु भुवनमें प्रविष्ट हो । पाश्चात्य घेशानिक भी मानते हैं। कर भनेक पस्तुभेदाम उसी प्रकारकी हो गई हैं, उसी ___पायुविज्ञान राब्दमें पिस्ता सिरप देतो। सरह एकही मर्यभूनको अन्तरारमा भनेक यस्तुमेवों में पाक (सपु०) पाय स्वाय फन् । पाप दया उगी प्रकारको है तथा ममो पदा के बाहर भी है। यार केतु (स' सी०) पाप फेधाजो यादन या यस्पा इसमे पायको विश्ययिसारिता प्रमाणित हुई। पुलि, धूल। इस पायुसे अग्नि उत्पा होती है। जैसे धु तिने यापकेश (स.नि.) या पत् घलनरश्मि, जिनको किरण पाय के समान तमंदो। . . "यापारग्निः"-तैत्तिरीय उपनिषत् ममानन्दपाती ११३ । पायकोण (स.पु० ) परिमोत्तर दिशा। " गायगे दो अग्निकी जो उत्पत्ति होती है, वैज्ञानिक | घायुगएट (स० पु०) गगी। युनिमे भी इसका समर्शन किया जा सकता है। विना | पाय गुल्म (सं० पु० ) पाय ना एन गुल्म प| mr. भषिसजनके दहन किया भमग्भय है । 'पाश्चात्य विहान-J धम, पर। २ पाय रोगमेद । पाय के कुपित होने से फे मामे अपिमान पायका एक प्रधान पादान है। जब गुल्मरोग उत्पन्न होता है, तब उसे पाय गुल्म करते • फिर पाय को यदि गति ( Motion ) कहा जाप, तो भो | है। इसमे हम लोग अग्मिकी उत्पत्तिका प्रमाण पामे हैं। ____ इसका लक्षण-रक्ष, मापानीय, 'गिपंग मोजम दार्पर स्पेन्सरने लिखा है- गत्यात मोजम, पलयाम्फे साथ पुद्र मोदि पिरुन घेण्या, - *Conversely. motion that is arrested produ. मलमूवादिका येगधारण, शोफपयुक्त. मनात पण,'दिर ces under different circumstances heat, clectri., सगादि द्वारा अत्यन्त मलाप गीर उपचास सब citr magnetirin and light. ...:Mehare anun. कारणीसे यायु कुपित होकर पायुजन्य गुम रपादन dant instances in which arises as motion करती है। यई गुल्म घरता पढ़ता और सारे परमै censes. First trinciple, p. 19s. . ‘फिरता रहता है। फमोरसमें दर्द होता गौरवमी महो यह पाय सर्वदा मम्मिफे साप सता रहता है। भी होता है। इस गुल्मरोग Re tr' मधोपात संव, गलशोष उपस्थित होता है। इस रोगीका " पारमान मारमादित्य द्वितीय पायुतीयम्।' । शरीर श्याम पा गणयणको ही जाता दक्षि , , दारपसक उपनिरन् । पाश्य, मह पौर शिरम घेदना होती है। चाहुंगा मर्थात् मग्नि, या भोर मारिप एक ही पलिया पदार्थ जप पच जाता है. तथा उपमेय मोरगी हो कर पृथियो, सरोश गौर लोक्मे घिटित है। सा है। पीछे मोशन करगेसे उसको जाति होतो पाप भलिका ant. सका गो प्रमाण मिलता । पद रोग माध्य, पाय,तिम और एटुपसप न.. दथ्य खानेसे पदमा (मापनि गुरुमगा). .. "पा मारापुरम मन्मदि" :. .. . . . . . गुरुमरोग देती। . ...प्रमाणि माहिए और दोनों पागोप( Eifa): पाय रसा,याय xिसकी रक्षा ....मिदा :साय संकप्रदमा और दो।