पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२०१

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वायुविज्ञान १७९ । लेम ( Lame ), धेफरेल ( Recrucral ) मोर पेलटियर | साथ प्रायः हो दक्षिण-पश्चिम और बढ़नेवाली चायुफे + ( Peltier ) आदि पण्डितीने गयेरणापूर्ण मालोचना की प्रवाहका सम्बन्ध है । इस वाय फे संस्पर्शसे सिरस मेघ है। माकाशमै पतङ्ग उड़ा कर पण्डितगण प्राचीन | क्रमशः घनीभूत होता, पाप भी फ्रमशः भाद्र हो जाती {सायमें भी इमफे सन्यन्ध अनेक तथ्य जान सके थे। है, इसके बाद वृष्टि होती है। Fमाधीयाले मेधको साथ तडित्को अति घनिष्ठता है । हम सिरोफ्यूम्यूलस-यह मेघ तापोनयका परिचायक विषय बढ़ जानेके भयसे और शासङ्गिकताके कारण | यहां उन सब यिपयों की हालोचना करना सुसङ्गत नहीं इस तरहका मेघफल-यिचार यूरोपीय वैज्ञानिकोंकी जसमझते। | गवेषणाके अन्तर्भुत है। किन्तु इसके सम्बन्ध भार- " मेघ और पियुव-प्रदेश । तीय पण्डितोंको गधेपणा हो अधिकतर समीचीन है। ा यिपुव प्रदेश साथ मेघोंका बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध | सन् १८६११०में म्यनिक (Munic) नगरमें इएटर. है। उष्णमएडलके धोत्रका प्रदेश सूर्यके उत्तागसे | नेशनल मिरिलिजिकल कन्फ्रेन्समें स्थिर हुआ, कि अधिकतर उत्तप्त होता है। उत्तत भूभाग और जलभागसे. मेघ साधारणतः पाच भागों में विभक है। जैसे- अधिक मात्रामें जलीयवाप्प आकाशके उच्चस्तरमैं उठ (क) आकाशके उच्चतर प्रदेशमें विचरण करनेवाले कर घनीभूत होता है। यह यहां बहुत समय तक अपेक्षा. मेघ ( Very high in the air ) | एन स्थिर रहता है, उससे भूभाग सूर्य के प्रचण्ड तापसे (ख) आकाशके उच्चतर प्रदेशमें विचरण करनेवाले कुछ देर तक बचा रहता है। अतपय जलाशयादिसे मेघ (At a medium hight )। " जलीयबाप्पोद्दमका परिमाण फुछ कम हो जाता है। ___(ग) भूपृष्ठफे निकटवती मेय (Lying low or near • इस तरह विपुर प्रदेशं जीयोंके रहने लायक रहता है। earth)। . मेधका कार्य। (घ) वायुफे उच्च प्रवाहस्तरस्थ मेघ ( In ascen.

"फेयल धारा परसा कर पृथ्वीको शीतल कर देना

ding current of air)। मेघका उद्देश्य नहीं है। मेघ द्वारा सूर्यका ताप और . (च) आकार परिवर्तनोन्मुख पाय (Masses of नेशयाप्पोद्गमका हास होता है। जीयजगत्के लिये • यह दो अवस्थायें प्रयोजनीय हैं। rapour changing in form)| मेधको फलगणना। ___ मेघ पापके घनीभूत दृश्यमान अवस्थामात है। माकाशमें कब कौन मेघ किस तरहका दिखाई देता | दो कारणोंसे पाप धनीभूत हो कर मेघके परिणत है, उसका कैसा फल होता है, हमारे पराशरसंहिता होता है। मादि शास्त्रोम तथा धाघ और बुड्ढोंके यन्त्रोंसे उसका (१) यायुका स्तर विशेष शिशिरवत् शीतल हो कर , बहुत, वियरण मालूम होता है। पाश्चात्य पैंज्ञानिक तत्स्थानीय जलीय यायोको न्यूनाधिक परिमाणसे गण भी इसके सम्बन्धी कुछ कुछ अनुसन्धान कर . साध्य जलदाकारगे ( Stratus ) परिणत कर सकता चुके हैं। यथा- . सिरस-अचे भाकाशमें मत्यन्त ऊपर इस जातिके (२) अथया साई यायुराशि शीतल जलीय याप- रजतशुम्न अन्नीको दौड़ते देखने पर जानना होगा, किन राशियों में प्रविष्ट हो कर उनकी गिरिनिभ मेघ ( Cum. शोध छो भाकाशमें परिवर्तन होगा। प्रोमकाल में यह ulus) परिणत कर सकती है। पृष्टि दोगेका पूर्ण लक्षण सूचित करता है। शीतकाल मेघराच्यविद् पण्टिनीने मेघोंको प्रायः चार भागों • इस जातिका मेघ देपर्स यह जान लेना चाहिये, कि विभक्त किया है। इनका माम सौर घिधरण पहले ही मीन ही मधिक माता तुपारपात होगा। इस मेघर लिखा जा युका है। यहां पल यही यक्तयाई, कि