पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२१

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वहेनिया किसी मृत पत्नी के स्वामीके साथ ही प्रथमतः विवाह, दिन 'भतवान' होता है, जिसमें आत्मीय स्वजनको मोज • करनेको वाध्य होती हैं। दिया जाता है। 'रमणीके गर्भवती होने पर उस गृहकी कोई युद्धा वा विवाहले दिन वर क्षीर-कर्मके बाद स्नान करके नाना गृहमन्त्री एक पैमा वा एक मुट्ठो नायल उस गर्भिणो रमणो. वेशभूपासे सुसजित होता है पर्व सन्ध्याके नमय घोड़े के मरतकमें छुपा कर कालूबीरकी पूजाके निमित्त अलग | पर सवार हो कर मामके कई स्थानोंमें परिभ्रमण करने- 'रख देता है। सूतिकागाग्में चमारिन धाई था कर के बाद घर लौट शाता है। इसके बाद वियाहफाल उप- प्रसव कराती है एवं नवज्ञान शिशुका गाडीच्छेद करके | नीत होने पर घरया घरके अन्दर ले जाते हैं एवं वर और पुष्णादि घर दाहर गाड़ देती है। गृहस्थ सूतिकागारके | कन्याफे एक जगह बैठ जाने पर कन्याके पिता मा कर सामने विल्बदण्ड इत्यादि रख कर भूनयोनिका प्रकोप | । दोनोंको 'पांव-पूजा करते हैं। इसके अनन्तर घे कुश निवारण करता है। ये लोग यथारीति शन्यान्य स्थानीय लेकर 'कन्यादान' करते हैं और चर कन्याको मांगमे उच्च वर्णों की तरह सूतिकागृहके अवश्यकरणीय कार्य 'सदुग्दाग' करता है। इसके पोछे वर और कन्याको सम्पादन करने हैं। जन्मके छठे दिन पष्ठी पूजा चादरों में 'गेट वन्धन' करके दोनों की मंडपके मध्य दंडके होती है। इस दिन प्रात फालमें प्रसूतिके स्नान करने चारों ओर पांच वार घुमाने हैं। इस समय उपस्थित पर धमारपनो सूतिकागार परित्याग करयो चली जाती | रमणियां उन दोनोंको देह पर भुट्टाका लाया छीटती । है। इसके बाद हजामिन आ फर प्रसूति के आवश्यकीय रहती हैं। कार्य करने लगती है। १२ दिनमें यरहो पूता पर्यन्त इसके बाद वर और कन्या कोयरघर जाती है। हजामिनको सूतिकागारमें रहना पड़ता है। इस गेज यहां वरकी सालो तथा पत्नीसाला नाना प्रकार की हंसी स्नान तथा नावत्यागके बादं प्रसूति और जातपालक | मजाक किया करती हैं। इसके पीछे जाति मुटुम्योंका शुद्ध हो कर अपने परियारफे साथ आहार विहारमै प्रवृत्त । भोज होता है। हाते हैं। इस दिन जाति कुटुम्बको भोज खिलाया विवाहके वाद कारवोर और निमन परिहारको पूजा जाता है। होती है। चौधे दिन पर गौर कन्या हजामिनको साथ ___इनलोगोंके विवाहको प्रधा अधिक अंश अन्यान्य किसी निकटबत्तों जलाशय पर जाती हैं एवं पवित्र जल निकृष्ट श्रेणियों की प्रथा मिलमो जुलती है। विवाहस पूर्ण "कलम" और "वन्धनवार" जलमें निक्षेप करके घर कन्या सुखी होगी या नहीं, यह विवाह गृहस्थका स्नान करती है । इसको वाद घर लौटनेके समय रास्ते मंगलजनक होगा या नहीं, इत्यादि बातें आचार्य से पता ) ग्रामक निकटवत्ती पोगलफे नीचे वे दोनों पितृपुरुषोंकि लगाया जाता है। जब सद लक्षण मंगलपूर्ण दीख उद्देशसे पूजा करती हैं। पड़ने हैं, तथ लड़के के पिनाके हाथमे कुछ दे कर वियाह मृत्युकाल उपस्थित होने पर ये लोग मुमूपुको गृह. को धात पको की जाती है। वहेलियों में दोला प्रथासे के बाहर ले गाते गौर उनके मुपमें गंगाजल, स्वर्ण विधाह होता है। इसमें विवाहको यात पकी होने पर तथा तुलसीय पत्ते रखते हैं। जित समय ये सब वस्तुए निर्धारित दिनसे आठ दिन पहले ही कन्या वरये घर नहीं मिलती, उस समय दही और सकर आदि मिष्टान्न • आना पड़ता है। योहा धूम धाम क्षेता है। विवाहके देते हैं। मृत व्यक्तिको श्मशानमे ला फर स्नान तीन दिन पहले मण्डप तैयार किया जाता है।.मएडपके । फगते हैं, इसके बाद उस मृत देहको नयोन कपडे पहना ठोक मध्यभागमें लाङ्गलके काष्ठखंड, बंशदण्ड और केले. कर निता पर रखते है । कार्ड निकटारमाय व्यक्ति मुखाग्नि • फा थंभ यांध कर उनके नीचे योखली, मूमल, गौता, देता है । दाहकर्म समाप्त होने पर स्नान करके ये लोग फलसी प्रवृत्ति यस्तुप सजा कर रखी जाती है। इस घर लौट गाते हैं एवं नौम धौर अग्निका स्पर्श करते हैं। . रोज सन्ध्याको समय 'मरमंगर' होता है । विवाहकै पहले दूसरे दिन पंडित आ कर हजामयो द्वारा पक्षकी डालो