पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२३९

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वारेन्द्र २०७ हत् सरोवर है। यह समचतुकोण है। यह प्राय: १२०० । च लभ्यो और १ फुट ऊंची है। दूसरी हरगोरोको .. फोट होगा। इसमें १२ फीट गहरा जल रहता है । इसके | मूर्ति है। चार भुजाके हर गौरीका चुम्यन कर बीच में पत्थरका एक लम्बा स्तम्भ है । यह जलके ऊपरसे रहे हैं। तोसरी मूर्ति ३ फीट ऊंची चतुर्भुज १० फोट लम्बा है ।सुनते हैं, कि वैशाषके प्रबर उताप. विष्णुमूर्ति है । चौथो छोटो एक मूर्ति पैठाई गई है। से जल'सूम जाने पर इस स्तम्भ पर खुदी हुई लिपि | वेटमाफेटने इसको बौद्ध कहा है। सौभाग्यशत: एक दिनाई देती है। बुकाननका अनुमान है, कि अबसे एक प्रतिमूर्शिके निम्नदेनको भान उपपोठमें देवनागरमें हमार वर्ष पहले धीयर राजाने इसे खुदवाया था। युद्धसूत्रका कुछ भश लिम्बा है। जैसे-- ____ यह कहनेको आवश्यकता नहीं, कि रामचरित. जो धर्महतुप्रभवाहेतु" इत्यादि । पर्णित कैवत्तराज दिपोकफे नामानुसार यह दिवोर क्षेत्रनालके ६-७ मोल उत्तर-पूर्व ओर नादियाल दोग्यो दोग्यो' का नाम हुआ है। नामक एक पोखरा है। इसके पोचमें एकटकी बनी क्षेत्रनाल। दोवार है। यह साधारणतः क्षेत्रनाल के नाममे पुकारा जाता है। देवीकोट। दिनाजपुरसे वांकुड़ा तक बड़े राजपधमें दिनाजपुरमे ६० पुनर्भया गदोके पूर्व-तट परदेयीकोट नामका एक प्राचीन मोल दक्षिण-पूर्व और वांकुड़ासे २४ मोल उनर पश्चिम- । दुर्ग संस्थापित है। यह स्थान पाण्डाके ३३ मोल में यह स्थान अममियन है। यहां वांकुड़ा जिलेका पफ | उत्तर पूर्व तथा दिनाजपुरके दक्षिण पश्चिम और गौड़के थाना है। प्राचीन दुर्गके ७० मील उत्तर मोर उत्सर-पूर्या शमें ____यहां प्राचीन ईका स्तूप, गृहन् जलाशय और अवस्थित है। एक समय यह देवीकोट निःसन्देश बाहुन पापाण-प्रतिमूर्ति विद्यमान है। थाने के दक्षिण में यय-! घड़ा एक जनपद था। इस समय भी नदाफ किनारे मित मिट्टीके स्तूप पर १२ फीट लम्या और ६ फीट प्रायः तीन मील स्थानमें इसका विन दिपाई देना है। चीड़ा पश मन्दिरका भग्नावशेष दिखाई देता है। यह एक कहते हैं, कि यहां वाण राजाका दुर्ग था। हिजरी सन् पुगपत्ति पीपल के वृक्षको अदमें भाच्छादित अवस्था-1 ६०८से ६२४ तक ग्यासुदीनने राजत्य किया । इसके में और १ फुट १०५च अंची और ११ इञ्च चौड़ी चतुः समयगे लक्ष्मणावतोसे देयोकोट तक एक चौडा राम मुंजा विष्णुमूर्ति है। सिवा इनफे पद प्रायः १ फुट बना था। १० फोट लम्यो एक पाश्मय रनौमूर्ति भग्नायम्धा | जिस स्थानमें देयोकोट अस्थित है, उस प्रदेशका याने यायें हाथका तकिया बना कर पाई बगल में लेटो । पहले "देयोकोट सदस्रयोय" नाम था। हुई है। इसके निकट ही एक मुन्दर बालक लेटा हुआ ! देयोकोटये. दुर्गके अंश तोन पाया है और ये है। इममूत्ति के भोपान पर एक सम्मो चमर ग मृाय प्राचीरसे परियेरित हैं। जिससे लोग दुर्ग रही है गोर परको ओर पूमरो दासी चरण सेवा कर रही ! कहते हैं, यद निविड जङ्गलसे परिपूर्ण है । उममें मनुप. दरम दादिगे हाध एक पुष और गिर पर गणेगादि का जाना मसामय है।गढ़ का भापतन प्रायः२००० फोट देवनामों छोटे छोटे विव हैं। शय्याफे नीचे फूल- ममवतु'कोण है। दुर्गके दक्षिण-पश्चिम कोण मुलतान फौम भरी डालोरी है। इसके पाइदेशा देवनागरा शाहको प्रमजिद है। इसके निपर ही जोर और मृत पारमें गोदित लिपि नामक दो कुएं हैं। मालूम होता है,किपद स्थान और ___शानके उत्तर कुछ दूर पर एक पोखरेसे निष्ट महा पूर्णयर्णित महास्थान एक ही कामे हिन्दू गौरवमे विध्युत देशों का एक माम मन्दिर है। यहां चार प्रधान मूर्तियां हुगा है। यहां जोयगड मौर महास्थान, जोयन्कुराष्ट्र हैं। एक तो पदले लिगो मीन्ति, इनमें मारा नया विद्यमान है। प्रहका चित्र भी दियाई देता है। यह मर्शि २ फोर६ देयोशेटफे उत्तर प्रायः १००० फोर समयनु.