पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२४१

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वारेन्द्र २०६ मानको ८६३ हिजरीको २४ जिलविज तारीख लिखी | कीर्शियों चांद मौदागरको है। शंकुधा अचल के कुछ है। फनिहम साहबका कहना है, कि यही नूरफुनव-, गंधो अपनेको चाँद सौदागरके और कुछ बामनिया. आलमका असली गुम्बज है। के चंगधर बतलाने हैं। पारेन्द्रदेश में गंध वणिक एक ' ' . 'नूरकुतुबके छहजारोके जरा उत्तर सोना मसजिद समय धनी कहलाते थे । जयपुरबाट रेलस्टेशनसे मेद मोल है। इसमें लिगि उत्कीर्ण है, इससे मालूम होता है, पश्चिम येलागायला नामक स्थान में गंध यणिक जागीय कि मुकदमशाह द्वारा E६० हिजरोने यह निर्मित हुई है। राजीवलोचन मण्डल मुर्शिदाबाद के सेठशको नरद इसके बनानेवालेने अपने पूर्वज नूरकुतुपमालमके नामके धनी था । १८यो प्राताम्दोके प्रथम भागों राजीवलोचन अनुमार इसका नाम कुतपशाही ममजिद रखा है। । मएडलको मृत्यु हुई। घेलागायला के द्वादश-शिव मन्दिर ., एकलयमा गुम्बज सोना मसजिदफे कुछ उत्तर | इस व्यक्निके ऐश्वव्यांका परिचय प्रदान कर रहे .. । • और दिनाजपुरको मोर जानेवाले पधर्म है। मालूम होता ___ २ गोयङ्गवासी ब्राह्मण श्रेणीभेद । है, कि इसके निर्माणकायोंमें एक लाख यपया पचं परेन्दभूममें आदियास होने के कारण यारेन्द्र नाम हुआ था। सीसे दमका पकलपना नाम पड़ा। इसकी हुआ । पारेन्द्र और रादोय ग्रामण कुल पस्यको पद पर टों पर भी हिन्दू-शितिश्यों द्वारा धनो प्रतिमूर्शि स्थान हमें ज्ञात हुआ है, कि ६५४ शक मादिशूरका अभ्युदयकाल म्यानमें दिखाई देती है। है। इस समय उन्होंने कनीजसे साग्निक ब्राह्मण लानेको ____ शादिना मसजिद केयल पाण्डोंमें ही नहीं, किन्तु चेष्टा फो। उनके सामन्त्रणसे गाण्डिल्यगोत्रज क्षितीश, घङ्गदेश मग एक भाश्वर्यको सामग्री है। इसकी भरद्वाज गोत्रज मेधातिथि, कश्यपगात धोतराग, स्टम्याई प्रायदा सौहाथ और चौड़ाई डेढ़ सौ हाथ यात्स्यगासज सुधानिधि और मायणगोत मॉमरि- होगी। इसके पत्रों में हिन्दू भाषासे खुदा हुमा काम पे पांव धर्मात्मा गौड़मएडलमें माये । वारेन्द्र के कुलशा. कार्य दिखाई देता है। ७७० हिजरी ६ रजवको (सन् का कहना है, कि ये पश्च महात्मा मादिशूरफे यसको १३६६६०को १४यों फरवरीको ) इलियास शाहक पुन . पुरा कर स्वदेश लौट गये। यंगाल लौट जाने पर यहां सिकन्दर शाहने इसको तय्यार कराया। इसमें जहाँ लोगेांने उन लोगों से प्रायश्चित्त करनेको कहा, जिन्तु नमाज पढ़ी जाती है, उसके सामने हो भरयो भापागे इन लोगोंने उत्तरमें कहा कि वेश्येशंगशालयिदों को कुरागको मायने खुदी हैं। . प्रायपित्त करने की आवश्यकता नहीं। इससे दोनों सके अलाये सत्तामघर सिकन्दरकी मसजिद' दलों में भयर संघर्ष उपस्थित हुभा। उस समय घे नामका मकान और कई भन्न डाहालिकाओंफे मिह है। पांचों ग्राह्मण अत्यन्त कोधित हो कर गाइदेशम भाषि __पापदुमा देखो। पूरफो समाम लौट भाये। गोदाधिपने इन मुदसे ' “योकुला शहरके १२ माल उत्तर 'या' नगरका सर हाल जान कर बडे सादरसे गंगा किनारके निकट भानावशेष दिखाई देता है। इस स्थान का पर्समान नाम हो धाग्ययुक भूमिगे इन लोगोको बसाया। यक्षको मापाके भनुसार चांदमुमा' हुआ है। स चांद- मुमा प्रामके निकर सोहराई गौराई माग दो सिले है। ___ आदिवारफे यज्ञ आये पांचों विनोंके यानरे, पुत्रीम दिलोको घोढ़ा पुछ कम होने पर भी सामान्य नहीं। शितोगदामोदर शीरि, विशेश्वरजादूर और महनारायण यह देख पर गुमान सा ,किपदले यह कहनदी. ये पांच, मेधातिपिके धोरर्प, गौतम, धापर, पा, निय, गर्म पा। मोरा पिलके बीच में पायोका चिह। दुर्गा, रवि धौर नये साठ योतराग सुपेण, दस, प्रयार, शिपिलमें माने जाने के लिये एक समयका भानुमिथ और रूपानिधि पे घार, सुधानिधि घरा. पना एक पप था। गो हो दिल शिनारे पर पुरानो | घरमौर छान्दद दामोर सामरिक सगभं, गर्भ रोफे टुकड़े पापा है। कहते है कि सप पराशर गौर मदेश्वर बार पुवो के दो माम पुल प्रग्यो Tol, XI,53