पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२५

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पक्षी। वाकुल-नाक परिष्य हृद्य, श्यास, कुष्ठ, मेह, ज्वर गौर कृमिनाशक । 'इसका | वाकछलाधित (सं० वि०) जो हर पातमें छलकी बात । फल-पिसवर्द्धक, कटु, कुष्ठ, कफ और वायुनाशक, | करते हैं। फेशका हितकर, प्रमि, घास, कास, शोथ, माम और पाकत्वच् (सं० लो० ) वाफ्य और त्वक् । पाण्डनिवारक 1 ( मारप्र०) . वाफत्विप (सं० क्ली०) वाइमाधुर्य, वाक्यका तेज। याकुल (सं० लो०) यकुलस्येदमिति धकुल ( तस्येदम् । पा | याक पटु (सं० त्रि०) याचा पटु । वाककुशल, वाग्मी, वात ४१।१२०) इस्यण । वफुल फल। करनेमें चतुर। याकोयाका (सं० क्ली०) कथोपकथन, वातचीत। वाकपटुता (सं० स्त्री०) वाक्पटु-भाये तल टाप । वाकपटुयाकोयापय (सं०को०) १' परस्पर कथोपकथन, वात । का भाघ या धर्म, वाक्पटुत्य । चौत । ( Dialogue )२ परस्पर तर्क। ३ तर्कविद्या । | वाक्पति (सं० पु०) याचा पतिः। १ वृहस्पति। २ छान्दोग्योपनिषद्, नारदने सनत्कुमारोंसे अपनी जिन | विगु । ३ अनवद्य वचन, पटु वाफ्य, निर्दोष बात ।। जिन विद्याओं के ज्ञाता होनेकी बात कही थी, उनमें | वाक्पतिराज (सं० पु०) १ सुप्रसिद्ध कवि हर्षदेव के पुत्र । 'पाकोवाय विद्या भी थी। पे राजा यशोवर्माके आश्रित थे। इन्होंने प्राकृतमें गौड़यहो पाकलह (सं० पु०) यांचा कलहः । यांप द्वारा कलह(गौड़वध ) नामक काव्यको रचना की है। ये भवभूतिके धातका झगड़ा। समसामयिक थे। २मालयका एफ परमार राजा जो याका (सं० स्त्री० ) घरकफे अनुसार एक प्रकारका सीयकका पुत्र था। इस नामका एक और राजा हुआ है। चाकोर (सं० पु०) याचि, कौतुक वाफ्ये कोर शुकप्रिय | पापतीय (सं० क्लो० ) वाकपनि-विरचित मन्ध । ( नैतिक स्यात् । श्यालक, साला। बा० २१७३१) वायकेलि (सं० स्त्री०) वाचा फेलिः । याफ्य हारा फेलि, वाक्पत्य (सं० लो०) यापतित्य । (काठक ३७१२ ) वातको फोड़ा। वाक्पथ (सं०नि०) वाफ्यकथनोपयोगी, धान कहनेके पाक्केली (सं० स्त्रो०.) वाक्कलि देखो। उपयुक्त। चाक्चक्षुस (सं० जी०) वाक्य और चक्षु । वाकपा (सं० त्रि०) वाक्पटु । (ऐतरेयना० २।२७) चाफ्यचपल ( सं० पु०.) याचा चपला। १ बहुत यात | याकपारुष्य (सं०को०) याचा कृतं पारुष्य । अप्रिय 'करनेवाला, बातें करने में तेज, मुंहजोर। २भड़: चाफ्योचारण, वाफ्यकी कठोरता। यह सात प्रकारको । मड़िया। व्यसनों के अन्तर्गन पक घ्यसन है। वाफछल (सं००) याचा छलम् । न्यायशास्त्र के अनु इसके लक्षण- . सार एक छल । यह तीन प्रकारका होता है, वाक्छल, "देशजातियानादीनामाकोशन्यतसंयुतम् । । सामान्य छल और उपचार छल । जप यत्ता साधारण | यद्वचः प्रतिकूमार्य वाक पाध्यं तदुच्यते ॥" रूपसे कह हुए कथनमें दुसरे पक्ष द्वारा अभिप्रेत अर्थसे अन्य की कल्पना उसे फेवल चकर-डालनेके लिये देशादीनां आक्रोशयस युत, उच्चैर्भाषणं आकोशः की जाती है, तब पार छल कहा जाता है। जैसे बताने व्यङ्गमवद्य तदुभययुक्त यत्प्रतिफूलार्य उद्वेगजननार्थ , कहा, "यह पालक नप कंवल अर्थात् नये कंदल | वायं तद्वापारयं वध्यते।' (मिताक्षरा) घाला है। इसका प्रतिघादी यदि यह अर्थ लगाये, कि देश, जाति और कुलशोलादिका उल्लेख करके जो "इस बालकके पास संध्या में नौ कंवल हैं, और कहे-नी। निन्दनीय याश्य प्रयोग किया जाता है, उसे यायपाध्य पंचल कहां हैं. गक ही तो है। तो यह घाफछल होगा। कहते हैं। जिसे जो चाश्य प्रयोग करना उचित नहीं, छभ शब्द देखा उस पापयके प्रयोग करनेसे घामपारुष्य होता है। प्रचलित Vol, XXI. 7 (याज्ञवल्यय)