पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२५५

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- वाशिक : अर्थात् समान घलके हैं, तब कौन किसको 'याधा दे। करने की विधि है, पोछे कुशवेष्टित गौदुम्मरोयको वसं सकती है!' :: : - द्वारा येटन करना होता है। याशिक लोग ऐसा ही किवा · · दर्शपौर्णमास यागमे जी द्वारा होम करे, धान द्वारा करते हैं। वस्रवेष्टन दो लोभमूलक होनेके कारण होम करे, ऐसो दो श्रुति हैं। यहां जौ और धान दोनों अप्रामाण्य हुआ, कुशवेष्टनको लोभमूला नहीं' कंद हो प्रत्यक्षश्रुतियोधित हैं। इस कारण जी और धानका सकते। विकल्प सर्वसम्मत है । इच्छानुसार जौ या घान इनमेसे - भारकारफो ऐसा सिद्धान्त करना भी उचित नहीं; किसी एक द्वारा होमः करने होसे यागसम्पन्न होगा। कितडाग भादिका उपदेश दृष्टार्थ है, धर्मार्थ नहीं। इसी प्रकार प्रशनस्थलमें भी श्रीदुम्बरोवेपन और श्रीदु । कयोंकि, वेदमें जिसे कर्त्तव्य वताया है, वही धर्म है, यह वरीस्पर्श करना, इन दोनों विषयको परस्पर विरुद्व जैमिनिकी उक्ति है। इस वातको भाष्यकार भो अस्वीकार ..समझने पर भी जौ और धानको तरह दोनोंका विकला है, नहीं कर सकते। दृष्टार्थ होने होसे धर्म होगा, इसका ऐसा सिद्धान्त करना ही भाष्यकारको उचित था। वेटन । कोई भी कारण नहों। प्रत्युत तण्डुल-निम्पत्तिके लिये स्मृतिको बाधित कहना युक्तिसंगत नदों है। वेदमें यदि ययादिका अवहनन, चूर्णके लिये तण्डल पेषण आदि विस्ता विलकुल न रहता, तो स्पर्शश्रुति-विरुद्ध होनेके हजारों दृष्टार्थ कम वेदविहित होने के कारण धर्मरूपमें माने कारण चेष्टन स्मुति अनादरणीय होने पर भी हो सकता: गये हैं। चार्वात प्रभृति विरुद्धवादी भी वेदविहित था। किन्तु वेदमें सैकड़ों जगह विकला देखने में आar अधार्थ कर्ममें भी पार्शताको कलाना करते हैं। बतएव • है। इतना हो कहना पर्याप्त होगा, गियिकाको जगह। चाहे दृष्टार्थ हो चाहे भद्दष्टार्था, वेदमें जिसे कर्त्तव्य कहा कलरद्वप.परस्पर विराद है, मतपय आनो परिक्षातश्रुतिके ! है, यही धर्म है। वार्शिककारने इस प्रकार अनेक हेतु साथ विरोध होने वेटनस्मृतिको मामा सिद्धान्त दिखलाते हुए भाष्यकारके मतका खण्डन किया है। करना एकदम असङ्गत हुआ है। वस्तुगत्या किन्तु प्रचना, उन्होंने भाष्यकारका मत खण्डन करके जैमिनि-सूत्रका स्थलों विरोध भी नहीं होता। क्योंकि केवल वेष्टन तो दूसरों तरहसे गर्घ लगाया है। स्पर्शश्रुति के विरुद्ध नहीं हो सकता। स्पर्शनयोग्य दो नोन उगली भर एधान छोड़ कर औदुसरोय उचा भाग-1 ___ वे करते हैं, कि जब यह स्थिर दुआ, कि शृति और का म्पर्श करना दो उचर है। 'सर्या गौदुम्बरो वेष्टगि | स्मृतिमें विरोध नहीं है; विरोध रहनेसे वह भतिद्वपके तिध्या' सूत्रकार ऐसा नहीं करते। 'मौदुसरी परियेथिला 'विरोधरूपमें ही पर्यायसित होता, दोनों ध्रुतिके तव्या' यही सूत्रकार का वास है। यहां परि शब्द का अर्थ विरोधकी जगह विला होता है, अर्थात् मिन्न भिन्न - सर्यभाग है. अर्थात् ' अवध्य भाग और अधोमाग इन ध्रुतिप्रतिपादित भिन्न भिन्न पलों में इच्छानुसार शेनो भागों का वेटन करना ही मूत्रकारके वाफ्का किसी एक कलाका अनुष्ठान करने होसे अनुष्ठाता चरि. तात्पर है। सभी स्थानको घेटन करना उसका अर्थ ता होते है। तब जहां प्रत्यक्ष परिदृष्ट ध्रु तिमें तथा स्मृति- महों है। पाक्षिक लोग औदुम्बरीय दोनों भाग वेष्टन | मे भिन्न भिन्न रूपोंका कर्तव कहा गया है, वहां भो करते हैं सदा, पर कर्णमूल प्रदेश येटन नहीं करते। | कोई एक अनुष्ठेय अवश्य होगा। उस अवस्था में प्रयोग ____पातिककारका कहना है, कि सर्व घेटन याक्य लोभ वा अनुष्ठान नियमझ लिये अनुष्ठातामों के अत्यन्त मूल भाष्पकारका कमाना सहन नहीं है।', शेकि हितषिरूपमे जैमिनिने कहा है, कि, श्रोत और स्मार्स समूचीको घेटन न करके कंवल मून और अप्रभागंको पदार्थ परस्पर विरुद्ध होनेसे भीतपदाका अनुष्ठान घेटन करनेमें कोई क्षति नहीं। फिर, यह भी सोचनेको होगा। धीनपदा के साथ विरोध न रहने पर स्मार्रा. ', यात है, कि मोदुम्बरीय साक्षात्म्पर्श किसी तरह संम्भव पदार्ग,श्रीतपदार्थकी तरह अनुष्ठेय है। स्मृतिकार नहीं होता, क्योंकि पहले कुश द्वारा गोदुम्यरीय वेष्टन | जावालगे कहा है-