पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२५६

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२२० वार्तिककार-वाद्धि h: "श ति स्मृति विरोधेन श तिरेव गरीयसी : यातिकाह्य (सस्त्रो०) सामभेद । . . . .. . - अविरोभे सदा कार्य स्मार्स वेदिकात्. सता " . चार्तिकेन्द्र (सं० पु०) किमियविद्यायित् (Aliclhealist)1.. श्रुति और स्मृतिका विरोध होनेसे श्रुति ही गुरुतरा बात्त ,न (स० पु० ) वृतघ्न इन्द्रस्यापत्य पुमान महन् : है। अविरोधको जगह स्मार्त पदार्थ वैदिकपदार्थको अण। . १ अर्जुन । २ जयन्त।' (लि०) पक्षन- ... तरह अनुष्ठेय है। ऐसी व्यवस्थाका कारण यह है, कि सम्मम्धीय। (भागवत ६।१२।३१)-'...." समी परप्रत्यक्षको अपेक्षा सुप्रत्यक्ष पर अधिक विश्वास बात तुर ( स० ) सामभेद। . . करते हैं। स्मृतिको मूलीभूत शाखान्तर विप्रकीर्ण ध्रुति वात्त हत्य ( स० वि०) वृनहननके निमित्त। ... . है, परप्रत्यक्ष होने पर मो, अनुष्ठाता अपनी प्रत्यक्ष ति वाई (सपु०) पार जलं ददातीति दा क। मेष, ..... पर गधिक निर्भर करनेको वाध्य हैं। जो भीर बादल। (वि.)२ जलदाता। ...... . .. धान दोनों ही प्रत्यक्ष श्रुतिधिहित है, अतएव विक- वाईर (स० को०) १ कृष्णलाघोज, घुघो। २ काक दिसत है। कोई मनुष्टाता यदि उनमें से एक अर्थात् केवल । विश्वा । ३ दक्षिणावरी शङ्का ४ भारती। ५ कमिज । ६ . जी या केवल धानसे सर्वदा यागानुष्ठान करें तो उसमें जल । ७ आनघोज । ८ रेशम । घोड़े के गले परकी जिस प्रकार दोप नहीं होता उसी प्रकार प्रतिस्पलमें दाहिनी ओरको मोरो। . . . .:... " श्रोत वा स्मार्स इन दो-से किसो एकका अनुष्ठान घाइल (सं० लो०) यागभिः सलिलैवलतीति दल भन् प्रास्त्रानुसार दोने पर भी. केवल धौतपदार्थका अनु- ; सदा मेघाच्छन्नदृष्टिपातात्तथास्त्र । १ दुर्दिम, यवलो। । छान करनेसे कुछ भी दोष नहीं हो सकता। प्रस्ता । (पु०) पाईदल्यतेऽति दल (पुसि सशाया प प्रायेण। यित अमिनिसूनको दूमरी तरइसे व्याख्या करके वात्तिक ! पा'।३ ११८) इति घ; २- मेलानन्दा, दयात। .. कारने यह भी स्थिर किया है, कि इस सूत्र द्वारा शब्दादि घाड़ (सं.पु०) पृद्धस्य गीतापत्यं ( भऋष्यानंतव्य विदा समतिके धर्म प्रामाण्य नहीं है, यही समर्थित हुआ है। म्याऽम् । पा ४११०४ ).इति अभयुद्धका गोला... इस प्रकार यात्तिककारने कई जगह भाष्यकारका मत पत्य। .. . . . . . । खण्डन करके अपना मत समर्थन किया है तथा कहो याक (सं०लो.) वृद्धानां समूहः (गोमोसोटारभति। , कहीं पे सूत्रको भी जएडा करनेसे बाज नहीं पाये हैं। पा ४१२३६) इत्यत्र व माच्चेति काशिकोक्ता युभ । १ . । स्यायचार्तिककार उद्योतकर मिश्रने भी इसी प्रकार स्वाधीन ! युद्धसंघात, घरसमूह | पद्धस्य भाषः कर्मति मनोहादि भाषसे अपना मत प्रकाश किया है। यातिक प्रग्यमान । मात त्यात बुभ् । युद्धका भाव या कर्म, बुढापा । (fro) ३ युद्ध हो इसी प्रकार स्वाधीन मत देने हैं। हा।: .:. :::.:..:.. : (पु० ) घृत्तिमधीते वैद या गृत्ति (फतूक थादिसूपान्तात् । यापय (सं० ठो०). याक.मेय वाक्य 'अनु. , , उफ । पा४।२।६०) ठक् । २ वृत्तिमध्ययनकारी, पृत्ति या | दित्वात्, स्वायें प्यम् । वृद्धावस्था, धुढापा । पर्याय पदक । ' भाचारशास्त्रका अध्ययन करनेयाला वृत्तो साधु वृद्धत्य, स्थायित्व। २ वृद्धि, बढ़ती। .. रिति युत्ति' (क्यादिभ्यप्ठक । पा ४।४।१०२) इति उक् ।। २ सूत्रयत्तिमें निपुण। ४ प्रतिश, चर, दूत वैश्य यादक्षान (सं० पु० ) पदक्षतका गोलापत्य, जपथ "यामि (सं० पु०) दक्ष का गोलापरय.: जाति। ६ वार्शिकाली, पेटेर । ७ पासाकु, यैगन ।। घाईनी (सं० स्त्री०) जलपास। . .......... यात्तिककार ( स० पु० ) यात्तिक' करोतीति अण । यार्सायन (सं० पु०) यास्य गोतापत्यं (हरितादिमोऽभा। यासिकप्राथफे प्रणेना! यातिशत (सं.) वारिक करोतीति छ किप पा ४१।१००.) इति फफ् । याका गोलापश्य, पया तुकंच। यातिककार। . . . गोता। ...... . .. - पालिका (सस्त्री०) यार्तिकराप । पक्षीविशेष, वटेर यादि (सं.पु.) पारि जलागि धोपन्तेऽति: पाकि। .. .::.:. समुदः। . . . . . . . . . . . . :