पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२५७

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वाद्धिमव-वाणिस २२१ वाद्धि भय (सं. लो० ) वादी समुद. भवतीति भू गच्। पण सूद ले, तो उसे पापो नहीं होना पड़ता, सूदखोर द्रोणोलवण | . . . . . . . महाजन इसी प्रकार अपना दायित्व समझ कर यांनु- वाच पि (सं० पु०) पाद्ध पिक पृषोदरादित्वात् कलोपः। सार ब्राह्मण ऋणासे सैकड़े पीछे दो पण, क्षत्रियसे तीन बाद विक, बहुत अधिक योज लेनेवाला, सूदखार। - पण पैश्य से चार पण और शूद्रसे पांच पण सूद माहवारी वाद्धपक (सं० पु०) या द्रव्यं वृद्धिः तां प्रयच्छतोति के हिसाबसे ले सकता है। (प्रयच्छति गर्ष । पा ४४४३० ) इति ढक् । 'घुर धुपि • " एक मास, दा मास घा तीन मासके करार पर यदि भावो वक्तव्यः' इति धार्सिकोतःधुपिभावः। घृद्धिजीवी, कोई कर्ज ले और साल भर बीत जाये, तो महाजनको सूदखोर । पर्याप-कुत्तीदक, व ध्याजीच, पाद्ध, यि, उचित नही कि उससे कगरसे अधिक एका पैसा भी सूद क.सीद, कु सोदक । (शब्दरत्ना० ) . . . . . लेवें। अथवा उसे अशास्त्रीय सूद लेना भी युक्तिसंगत जो समान मूल्य में :धान आदि खरीद कर अधिक नहीं है । चक्रवृद्धि, कालचुद्धि अर्थात् मूलधनसे दूनी मूल्य में - देता है उसे वाद्ध पिक कहते हैं । .याच पिक अधिक वृद्धि, कारिता (विपदमें पड़ कर ऋणा जो सूद प्यक्तिफा हव्य कथ्यमें नियुक्त करना उचित नहों। देना कबूल करता है ) तथा कारिकावृद्धि अर्थात मति. . .याज इच्छानुसार नहीं ले सकते, लेनेसे दण्डनीय शय पोड़नादि द्वारा लब्ध वृद्धि, ये चारों प्रकारको वृद्धि होना पड़ता है। शास्त्रमें वृद्धि या ध्याज लेने का निर्दिए विशेष निन्दित है। यदि प्रतिमास सूद न ले कर असल नियम है। याज्ञवल्क्यसंहितामें लिखा है, कि पंधी और सूद एक साथ लेना चाहे, तो यह मूलधनके दूनेस चोजमें सैकड़े पीछे अस्प्ती भाग एक भाग मायारी सूद अधिक नहीं ले सकता। (मनु ८०) सौर जो चीज यंधक नहीं है उसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, हौश्य | भगवान मनुने कहा है, कि सूदखोरका अन्न नहीं और सूद इन चार वर्णो से यथाक्रम सैकड़े पाछे सौभाग, खाना चाहिये, खाने से विष्ठा खानेके समान पाप होता में दो भाग, तीन भाग, चार माग और पांच माग भर्थात् है, क्योंकि उसका भन्न विष्ठा सदश है।. . माहाको' सी पण कर्ज देने पर उनसे प्रतिमासमें दो| सभी शास्त्रों में वृद्धिजीवोंको निन्दित कहा है, विशे- पण, क्षत्रियसे तीन पण इत्यादि कमले सूद लेये। पतः ब्राह्मणके लिये यह देोपायह और पातित्यजनक 1ो वाणिज्यके लिये दुर्गम स्थान में जाते है, घे सैकड़े हैं। पीछे चीस भांग सूद दे। अथवा समो वर्णों को याद पिन् ( स०.पु.) वृद्धिजीवी, सूदखोर। . . . चाहिये, कि ये सभी जातिको ऋणफे समय अपनी अपनो वाईपी (सं० स्त्री० ) अधिक ब्याज पर कर्ज देना ।।। निदियघ.द्धि दें। बहुत दिनका ऋण रहने पर, फिर पार्द्धय (म० लो०) वाद्ध पेर्भाव, पाच पि पम् । धीच पोची सूद नहीं लेने पर सूद कहां तक बढ़ सता धान्यवर्धन, अन्नको अधिक व्याज पर देनेका ध्ययसाय । है, उसका विषय इस प्रकार लिखा है,-ना, पशु अर्थात् यह निन्दित कार्य है। . .., गाय भादि यदि कर्जमे लो जाय तो उनका सूद उतना हो या य (स० क्लो०.) पा समुदस्पेदमिति पार्टि दम्। बढ़ेगा जितना बछड़े का मूल्य होगा, रस अर्थात् घृत, द्रोणोलपण । (राजनि०) सैलादिका सूद मूलधनसे आठ गुना बढ़ेगा। पत्र, · बाद, (सं० लो०) पद्ध, इमिति बद्धी (चर्मयोऽभ । पा धाम्प मौर सुपर्णका दूना, तिगुना भौर चौगुना सूद ६।१।१५) इति अम् । चर्म रज्जु, चमड़े को बद्धी। होगा। बादधुपिक अर्थात् सूदखोरको इसी नियमसे : पाणित (सं० पु०) याचीव नासिकास्पेति (भम् नासि. सूद लेना चाहिये। ( याश्वल्क्य स. २०) काया सशायर्या नस चास्थूलात् । , पा ५४।११८) इति मच .... मनुने ( ८ म.) पृद्धिक विषयमें ऐसा हो लिखा नसादेशश्व (पूर्व पदात् मायामगः । पा ८४३ ) इति है-उत्तमर्ण या महाजन यदि साधुओका माचार एमरण णत्वं । १ पशु विशेष, गेंह।। गपहार देखो। ,२ छाग कर बन्धकरहितको जगद प्रतिमासमें सैकड़े पोछे दो भेद, यह धिया परा जिसका रंग सफेद हो मौर ___Vol, xxI, 66