पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२६७

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. वासन्ती-वासन्तीपूजा २३११ घली, मधूत्सक, सुपसन्त, कामसह, कर्दनी । (पिका० ) ,पूजाको भी उसी प्रकार जानना होगा। इसमें भी ५ गणिकारी, गनियारी : नामक फूल ! पर्याय-प्रह- स्नपन, पूजन, होम और वलिदान उसी प्रकारसे होता , सन्ती, वसन्तजा, माधवी, महाजाति, शोतसहा, मधु । है, को विशेषता नहीं है। यह पूजा नित्य है, इसलिये घहुला, बसन्तदूती। गुण-शोतल, हद्य, सुरभि, श्रम ! सोंको यह पूजा करनी चाहिये। यदि कोई सप्तमोरो धारक, मन्दमदोन्माददायक । (राजनि०) ६ नवमल्लिका, पूजा न कर सफे. तो अष्टमो तिथिमें पूजा करे। अएमोमें नेवार । ( भावप्र०) । असमर्शमानेसे फेवल नवमी तिथिमें पूजाका विधान ६ दुर्गा। वसन्तकालमें दुर्गादेवीको पूजा की जाती है। अमीसे आरम्भ करने पर उसे अष्टमी कल्प और है, इसीसे इनका नाम वासन्ती पड़ा । शरत और नवमोतिधिमे पूजा करनेसे उसे नवमी कल्प कहते है। वसन्त' इन दो ऋतुओंमें भगवती दुर्गादेवीको पूजाका ' सप्तमी, अष्टमो और नवमी तिथि विधान रहनेसे उनमें- विधान है। शरत्काल की पूजा अकालपूना है, इसी से किसी एक दिनमें पूजा कर सकते है, ये सब विधान कारण शरत्कालमें देवीका वोधन करके पूजा करनी देखने से यासन्ती पूजामें सप्तमी, अष्टमी और नवमी ये होती है। शरत्ऋतु देवताओं की रात्रि है, इस कारण | तीन पल्प देखने साते हैं। सकाल है, किन्तु वसन्तकालकी पूजा कालबोधित पूजा इम पूजामें शारदीया पूनाको तरह चण्डीपाठ करना है, इसीसे वासन्तीपूजामें देवीका वोधन नहीं है। होता है। पष्टोके दिन सायंकालों पिल्यवृक्षके मूलको ___ "मीनराशिस्थिते सर्य शुक्लपक्षे नराधिप । । सामंत्रण और प्रतिमाको अधियास कर रपना होता है। सप्तमी दशमी यावत् पूजयेदम्बिको सदा॥ दूसरे दिन मप्तमी तिथिगे मामन्तित विल्पशाखाको काट ". भविष्योत्तरम- कर उसको यथाविधान पूजा करनी होती है। इस पूजामें धेरे मासि सिवे पक्षे सप्तम्यादिदिनत्रये । और सभी विषय शारदीया पूजाफी तरह जानने होंगे। • पूजयेद्विधिया,गा दशम्याच विसईयेत ॥" : ब्रह्मवैवर्शने लिखा है, कि पहले परमात्मा श्रीकृष्ण सूर्यके मीनराशिमें जानेसे अर्थात् चैत्रमासमें सप्तमोजप गोलोकधाममें रास करते थे, उस समय मधुमासमें से दशमी तक दुर्गादेवीको पूजा करनी होती है। चैनको प्रमन्न हो कर उन्होंने ही पहले पहल गगवती दुर्गादेवीको शुक्ला , सप्तमा होसे पूजाका मारम्भ है । • यहां चैत्र पूजा को घी । पीछे विष्णुने मधुफैटभ युद्ध के समय देवीके शब्दसे चान्द्रचैत्रतिधिका बोध होता है। मोनराशिमें शरण ली तथा उस समय ब्रह्म ने देवी भगवतीको पूजा सूर्यके जाने पर ही पूजा होगी, ऐसो नहीं । चान्द्रतिषिफे की। तभीसे इस पूजाका प्रचार है। . अनुसार मोन और मेष इन दोनों राशिमें सूर्यके जानेले। इसके बाद समाधि वैश्य और सुरथ राजाने भगवतीको अर्थात् चेन मीर धैशाख इन दो मासोंके मध्य चान्द्र चैत्र पूजा की। इस पूजाके फलसे समाधिवैश्यको निर्माण शुक्ला सप्तमोसे पूजा करनी होगी। यह पूजा तिथिकृत्य | गौर सुरथ राजाको राज्यलाभ हुआ था। होनेसे चान्द्रमासानुसार होती है, सौरमासानुसार नहीं ७पक प्रकारका छन्द । हम छन्दः प्रतिचरणमें १४ •होती।' ' , ' । अक्षर रहते हैं। ६.७, ८, यां अक्षर लघु भीर वाकी मो. यथाविधान प्रतिवर्ष यासन्ती पूजा करते हैं, मक्षर गुरु होते हैं। उन्हें पुत्रपौत्रादि लाभ होते हैं तथा उनकी समी वासन्तीपूजा (सं० सी० , वासन्तो ताण्या पूजा । चैत्र- कामनाये पूरी होती हैं। मासको दुर्गापूजा। शारदीय दुर्गापूजाके विधानानुसार यह पूजा परनी। "मासि सिवे पक्षे नवम्यादि दिनये । । । होती है। पूनामे . फोई विशेषता नहीं है, शारदीया पूजा प्रातः मातर्महादेवी दुर्गा भक्त्या पपूजयेत् ॥":.: . जिस प्रकार चतुरपययी है अर्थात गपन, पूजन, होम | .. (मायातन्त्र ७ पटक्ष) और बलिदान इन चार अपययोंसे विशिष्ट है, यासतो . इस अष्टमी तिधिर्म अर्थात् चैत्रमासको शुक्ला अष्टमी