पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२८१

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। वास्तु-वास्तुप २४७ घरका ईशानकोण प्लय होनेसे पुत्रको हानि होती। योग, वास्त पूजादि सम्बन्धमे भी भनेक संस्कृत नग्ध है । इसी प्रकार दक्षिण प्लव होनेसे वीर्यहीनता. अग्नि | देखे जाते हैं । यथा- कोण प्लव होनेसे बन्धन, वायुकोण लय होनेसे पुत्र । करुणाशङ्का और कृपाराम रचित वास्तु चन्द्रिका, और सुतृप्तिलाभ, उत्तर प्लय होनेसे राजमय तथा पश्विम नारायणभट्ट रचित वास्तु पुरुषविधि, याठिकदेवरुन प्लव होनेसे पीड़ा, बन्धन इत्यादि फल होता है। गृहके वास्तुपूजनपद्धति, शाकलीय बाम्नुपूजाविधि, वासुदेवका उत्तर ओर द्वार करनेसे राजमय, सन्ताननाश, सन्तति वास्तुप्रदीप, गमकृष्ण भट्टकृत माश्यलायतगृह्योक्त धास्तु- होनता, शत वृद्धि, धनहानि, कलङ्क, पुत्रविनाश आदि शान्ति, शौनकात वास्तुशान्तिप्रयोग, दिनकरभट्टकी नाना प्रकार के अशुभ होते हैं। वास्तुशान्ति, स्मार्स रघुनन्दनका धास्तुयागतत्व, टोडर- ___ अभी पूर्वद्वारी गृहका फल लिया जाता है। ग्रहके मल्लका टोडरानन्द या वास्तुसौख्य । पूर्व भोर द्वार बनानेसे अग्निभय, अनेक कन्यालाम, धन | वास्तु (म० पु०)१ सम्बन्ध, लगाव । २ मिलता। प्राप्ति, मानवृद्धि. पदावति, राज्यविनाश, रोग आदि फल | ३स्त्री और पुरुषका अनुचित संबंध । हुआ करते हैं । गृहद्वार-निर्णय करनेके विषयमें ईशानसे वास्तुक (सं० क्ली०) धास्त पत्र वास्तु-स्वार्थे फन् । ले करें पूर्व पर्यन्त दिगभाग पूर्वदिक, अग्निसे दक्षिण | १शाकभेद, वथुभा नामका साग । इसे अंगरेजी में पर्यन्त दक्षिणदिक, नैतसे ले कर पश्चिम पर्यान्त Chenopodium album, महाराष्ट्र में चायत और पश्चिमदिक तथा यायुसे उत्तर पर्यान्त' उत्तरदिर | कर्णाटमें चक्रवर्त्त कहते हैं। कहलाता है। गृहफे चार दिशाको माठ भाग करके द्वार | भावप्रकाशके मतसे यह वास्तु क शाक छोटे और प्रस्तुत करनेका फलाफल माना जा सकता है। पड़े पत्तेके भेदसे दो प्रकारका होता है । चकाइतके मतसे पास्त भवनके पूर्व में पोपल, दक्षिणमें पाकड़, पश्चिम इसका रस पकाने पर लघु, प्रभावमें कृमिनाशक तथा में न्यग्रोध, उत्तरमें गूलर और ईशानकोणमें शासमलो पृक्ष मेधा, अग्नि और चलकर है । क्षारयुक्त होनेसे यह कृमिन, लगाना चाहिये । इस विधिके अनुसार गृह और प्रासाद | मध्य, रुचिकर तथा अग्नि और बल द्धिकर माना बनानेसे सर्वविघ्न विनष्ट होता है। ( गरुडपु० ४६ ५०)। गया है। राजनिघण्टु रे मतसे इसका गुण मधुर, शीत ' इसके अलाया मत्स्यपुराण, अग्निपुराण, देवीपुराण, क्षार, ईपदम्ल, विदापन, रोचन, ज्यरन, अर्शोन तथा मल युक्तिकल्पतरू, यास्त कुण्डली आदि ग्रन्यों में वास्त के मूत्रशुद्धिकारक है। अति संहिताफे मतलं इसका गुण- सम्बन्ध विस्तर- आलोचना देखी जाती है। विस्तार | मधुर, हृद्य तथा पात, पित्त और अर्शरोगके लिये हित. शोर पुनशक्ति हो जानेके भयसे उनका उल्लेख यहां नहीं) किया गया। गृह और प्रासाद शब्द देखो। २ जीवशाक । ३ पुनर्नवा, गदहपूरना। फिर भनेक प्राचीन प्रन्योंमें वास्तु-निर्माणको प्रणाली | पास्तुकशाकट (सं० लो०) वास्तुकशाकक्षेत। लिपिबद्ध हुई है। उनमें विश्वासरचित विश्वकर्मप्रकाश (राननि०) भौर विश्वकीय शिल्पशास्त्र मयदानवरधित मयशिला पास्तुकाकार (सं० स्त्री०) पदृशाफ, पाट या पटुऐका 'और मयंगत, काश्यप गौर भरद्वाजरचित वास्तु तत्त्य, | साग । घेतानम मोर सनत्कुमाररचित यास्त शास्त्र मानवसार | धास्तुकालिङ्ग (सं० पु०) तरम्घुजलता, तरबूज । या मानसार यस्तु, सारस्वत, अपराजितापृच्छा वा सान (वास्तुको (सं० स्त्री०) चिल्लो शाक । रत्नकाप, हयशीर्षपञ्चराल, भोजदेव रचित समराङ्गणसूत्र. यास्तफर्मन् (२० लो०) वास्तु के भारम्भमें करने योग्य धार, सूत्रधारमएडन रचित वास्तुसार या राजवल्लभमएडन अनुष्ठान।. . . या सलाधिकार, महाराज श्यामसागर-रचित वास्तुप (सं० वि०) यास्त पा-क। वास्तुपति, यास्तके : यास्तुशिरोमणि मादि अन्य उल्लेखनीय हैं। इनके सिया | अधिष्ठाझी देवता ।