पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२८३

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पास्तुयोग २४ प्रातांकृत्यादि करके पहले स्वस्विाचन और संकल्प करें। है। घट और फलसको जलसे भर कर उसके ऊपर 'स्वस्तिवाचन यथा-ओं कसंध्येऽस्मिन् वास्तुयागकर्मणि पश्चपल्लव तथा अखएड फल और शान्तिकलसमें पञ्च. 'भो पुण्याह भवन्तोऽधित्र यन्तु, भों पुण्याही पुण्याह रत्न डाल कर उसको कपड़े से ढक देना होगा। पीछे ‘ओं पुण्याई, यह कह कर तोन बार अक्षत छोटना होता होताको पञ्चगव्यके पृथक् पृथक् मन्त्र द्वारा उसे शोधन है.1ो कर्तव्येऽस्मिन् वास्तुयागकर्मणि ओं ऋद्धिर्भ प.) कर निम्नोक्त मन्त्रसे कुशोदक देना होता है। मन्त्र इस न्तोऽधिवं वन्तु भो ऋद्धाता मो ऋद्धाता मो ऋयताम् । प्रकार है- 'पोछे भो कर्तव्येऽस्मिन् घास्तुयागकर्मणि मो स्वस्ति ॐ देवस्य त्या सवितुः प्रसवे अश्विनीमयां भवन्तोऽधिव वन्तु ओं स्वस्ति ओं स्वस्ति भो खस्ति । पुष्णो हस्ताभ्यां हस्तमाददे। पीछे पञ्चगव्य और इसके बाद 'स्वस्तिनो इन्द्रः' इत्यादि और पीछे 'सूर्य: फुशोदकको एकत्र कर गायत्री पढ़ने के बाद वेदी पर सेक सोमो यमः काल' मन्त्रका पाठ करें। जो सामवेदी हैं, करना होता है। इसके बाद पष्टिकधान्य, हैमन्तिक. ये साम राजामं परुणमग्निमित्यादि मन्त्र पढ़। इसके धान्य, मुद्ग, गोधूम, श्वेतसर्पप, तिल चौर यवमिश्रित वाद सूर्याी और गणपत्यादि पूजा करके संकल्प करना जल द्वारा फिरसे घेदीको सेक करना होता है। होता है। जिस पोशामें संकल्प किया गया था, वह जल ___ वास्तुयागको घेदी पर पांच वर्णके चूर्ण द्वारा वास्त- ईशानकोणमें फेंफ कर घेदानुसार संकल्पसूक्तका पाठ। मण्डलको प्रस्तुत करना होता है । उसी यास्तुमण्डलमें करना होता है। पूजा करनी होगी। घेदीके पूर्वाश मण्डल करनेकी देवप्रतिष्ठा और मठप्रतिष्ठा आदि कार्यो में जो यास्तु- जगह ईशानकोणसे ले कर मण्डलके चारों कोनों में चार "याग होता है, उसके संकल्पमें घोहीसो पृथक्ता है। खैरके खूटे मन्त्र पढ़ कर गाड़ने होते हैं।

तिथ्यादिका उल्लेख कर देवप्रतिष्ठा होने पर "एतद्वास्तूप- इसके बाद अनि सर्प आदिको मासभक्त धलि दे

शमनदेवप्रतिष्ठाकर्माम्युदयार्थ", मउप्रतिष्ठा होनेसे पत | कर उन गड़े हुए चार खैरके खूटीके बीच वास्तुमण्डल "दास्तूपशमनमठप्रतिष्ठाकर्माभ्युदयार्थ सगणाधिपत्यादि बनाये । इस मण्डलके चारों कोणमें घनमालासमन्धित 'रूपमें सङ्कल्प करना होता है। चार कलस और वीवमें ब्रह्मनंट स्थापन करे । इस प्रकार इस प्रकार सङ्कल्प करके जो सब ग्राह्मण यश फरेंगे घटस्थापन करके पाय के घटमें नवमहको पूजा और उनका वरण कर देना होगा। परणकालमें पइले गुरुका पूर्वादिकमले पुनः भूनादिको मासभक्त बलि देनी होगी। . परण करके पोछे अन्यका घरण करना होगा। गुरु उक्त प्रचारसे बलि दे कर यथाविधान सामान्य • घरगफे-याद प्रलयरण, ब्रह्मवरणके वाद होतृवरण, अर्घ्य और न्यासादि करने होते हैं। इस समय भूत- भावार्णवरण और सदस्य चरण करना होगा। इन तीन- शुद्ध करना आवश्यक है। .चरण वाफ्यों में कुछ भो विशेषता नहीं है, केवल होत. अनन्तर मण्डल में ईशानादि पैतालीस देवताओं तथा परणको जगह होतृकर्म करणाय, भाचार्यावरण की जगह मण्डल पाम स्कन्दादि अट देवताओं का संस्थापन ..माचार्याकर्मकरणाय भवन्तुमहं वृणे' इस प्रकार कहना करफे यथाशक्ति इनकी पूजा करनी होती है। ईश रहा. होगा। गच्छागच्छ इह तिष्ठतिष्ठ अनाधिष्ठान फुरु-मम पूजा कृती इस प्रकार चरण करके पोछे पृद्धिश्राद्ध करे। गृहाण' इस प्रकार आवाहन करके पूजादि करनेका विधान • 'मोर प्रतिगण यथाविधान यह यक्ष भारम्भ कर दे। कर्म- है। एतत् पाद्य ईशाय नमः इस प्रकार पाचादि उप.

कर्ता यदि पुरुष हो, तो वृद्धिश्राद्ध करना होता है, स्त्री चार द्वारा पूजा करनी होती है। . .

होनेसे पृद्धिश्राद्ध नहीं होगा। .. - ईशादि पैतालीस देवता ये सब हैं-१ ईश, २ पर्जन्य, , यास्तुपागके लिपे जो घेदी बनाई गई है उस वेदी . ३ जयन्त, ४ शक, ५ भाकर, ६ सत्य, ७ मृश, ८ प्योमन्, • पर ५ घट और १ शान्तिकलस स्थापन करना होता! ६ अग्नि, १० पुपन, ११ वित, १२ गृहशत, १५ यम, Vol, xxI, 63