पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२९१

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वास्तुयाग-वास्तोप्पांच २५३ ' - होने के बाद अपशिष्ट उनतीस घरों में पूर्वादिकमसे दक्षिण-, हैं, उनके अनुसार गृहमें प्रवेश करना होता है। गृह और

वर्समें मङ्कित करना होता है।

! बाटो शब्द देखो। . . , पर्जन्य एफपदके नोचे माप, श्वेत, एकपद (५३) वास्तुवस्तुक ( को०) वास्तुक शाक, पधुभा नाम. • उसके पार्शम जपन्त द्विपद के नीचे मापयत्स, गौर, का साग। एकपद (५४ ) उसके दक्षिण कुलिशायुध सूर्य, सत्य- पास्तुविधा (स स्रो०) पास्तुविषयक विद्या, वह पदत्रयके नोचे अर्यमा, पापपुरवा, विपद (५५) भृश विद्या जिससे वास्तु या इमारतके सम्बन्धकी सारी द्विपदके नीचे इन्द्रात्मज, पोत, एकपद (५८) आकाग। वातोका परिज्ञान होता है। शिल्पशास्त्र देखो। पकपदके नीचे सावित्र, रत, पकपद (५६) गृहशत, | वास्तुविधान (स० लो०) वास्तुनो विधान। वास्तु. यम, गन्धर्वा इन तीन घरों के नीचे विवस्वत्, रक्त, त्रिपद विषयक विधान, पास्तु विधि । (६२) राज छिपदके नीचे वियुधाधिप, पीतवर्ण, वास्तुशान्ति (सं० स्रो०) चे शान्ति आदि फर्ग जो नवीन एकपद (६३) मृग एकपदके नीचे जय, श्वेत, पकपद | गृहमें प्रवेश करते समय किये जाने हैं। (६४) पुष्पदन्त, यरुण, मसुर, विपदके नीचे मित्र, वास्तुशास्त्र (सं० लो० ) वास्तुयिपरक शास्त्र । यास्तु. शुक्ल, विपद (६७) शोप द्विपदके नीचे राजयक्ष्मा, पोत, विषयक शास्त्र, वास्तुविधा। जिस शास्त्र में शान रहनेसे • एकपद (६८) रोग, एकपदके नीचे रुद, शुक्ल, एकपद ! वास्तुविषयक सभी तरस जाने जा सकते हैं उसे वास्त • (६६) भल्लार, सोम, सर्प विपदके नीचे पृथ्वीधर, शास्त्र कहते है। शिल्पशास्त्र देखो। श्वेत, त्रिपद (७२) मध्यस्थल नी घमें ब्रह्मा, रक्त- वास्तुसंग्रह ( स पु०) वास्तु शास्त्रभेद । वर्ण, नवपद (८१)। यास्तुह ( त्रि०) वास्त हन्ता, निवित् स्थान हनन· . इस प्रकार ८१ घर पूर्ण करके मण्डल के वाहर चारों कारी। (ऐतरेयवा० ३।११) कोणमें चार पुत्तलिकाको तरह अङ्कित करे, ईशानकोणमें वास्तूक (सं० पु. क्ली०) वसन्ति गुणा अत्रेति यस ऊन्लूका. घरको रक्तवर्ण । (१) अग्निकोणमें विदारी कृष्णवर्ण । दयश्चेति साधु । शाकविशेष, वधुआ। पर्याय--वास्तू, (२) नैमृतकोणमें पूतना श्यामवर्ण (३) वायुकोण बास्तुक, वसुक, वस्तु क, हिलमोचिका, शाकराज, राज- पापराक्षसी गौरवर्णा (४)। शाक, चक्रातीं। गुण-मधुर, शीतल, क्षार, मादक, उक्त प्रकार से मण्डल बना कर उसमें उलिखित देव- त्रिदीपनाशक, नविकर, ज्वरनाशक, अर्शरागमें विशेष ताओंकी पूजा करनी होती है। वासगृहमतिष्ठास्थलमें / उपकारी, मल और मूत्रशुद्धिकारक। (राजनि०) पकाशीतिपद वास्तुमण्डल बना कर उसमें पारतुयाग | वास्ते (१० अध्य०) १ निमित्त, लिये। २ हेतु, सपत्र । करे। वास्तेय (सनि०) १ वस्तिसम्बन्धी । २ यस्तसम्बन्धी। वास्तुपागतत्व में लिखा है कि यदि वास्तुयागमें ३ वास्तु मम्यन्धी । यस्तो भय ( दृतिकुक्षिकलशिवस्त्यस्यहे यह मण्डल न बना सकें. तो शालग्राम शिला पर उन सब दम् । पा ३२५६ ) इति दश् । ४ वस्तिमय । (छान्दोग्य. देयतामोंकी पनादि करे। १२) वस्तिरिय यस्ति ( वस्त्रे दस्। पा ५३३१०१ ) ___ यह विधान असमर्थ के लिये जानना होगा। उक्त इति दम्।५ वस्तिसद्दश । प्रकारसे मण्डल बना कर ही वास्तुयाग करना उचित है। वास्तोप्पति (स० ० ) वास्तोगुहक्षेत्रस्य पतिरधिष्ठाता पास्तुयागफे शेपमें दानादि द्वारा ब्राह्मणों को परितोष करे।। यास्तोष्पतिगृहमेघाच्छ च ।' इति निपातनात मलुक पुरोहितको सर्वोपधि द्वारा यज्ञमानका शान्तिविधान पत्यञ्च, या वस्त्यन्तरीक्षतस्प पति: पाता विभुत्वेन' करना चाहिये। इस प्रकार वास्तुयाग करनेसे पास्तुफे . इति निघण्टुटीकायां देवराजयस्वा ५४६) १न्द्र। सभी दोष जाते रहने हैं। (वास्तुयागतल) . २देवतामात्र । ( भागवत ११५०५३) (लि. ) गहपाल. ___पास्तुपाग करने पर मो गृहप्रवेशकी जो सब विधियां पिता, घरका पालन करनेवाला । (शुक ५४ ) Vol, AIL 6