पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३०५

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२७४ वाहुन-विंशति भाग, काँखा पर्याय-कक्ष, भुजवाटेर, दाल, सण्डिक, वाहक (सपु०) १ देशभेद। एक देश जो भारतको कक्षा। उत्तर पश्चिम सीमा पर था। साधारणत: आज कलफे पाहुल (सं०.पु.) १ कार्तिक मास। २ व्याकरणका 'बलख' के आसपासका प्रदेश हो जिसे प्राचीन पारसी अनुशासनविशेष | पवर्गमें देखो। 'वकतर' और यूनानी 'वैक्ट्रिया' कहते थे, वाहीक घाहुल्य (सं० प्लो०) पहुलस्य भावः प्यण! आधिक्य, माना गया है, परन्तु पाश्चात्य पुरातत्त्व घिद इसे आज कलके भारतवपके वाहर नहीं मानना चाहते। ___ अधिकता। . पाचार (सं० पु०) श्लेष्मान्तक वृक्ष, बहेड़े का वृक्ष । २ वाहीकदेशजात घोटक, वाहीक देशका घोड़ा। पार्क (सं० पु०) छद्मवेशी नलराजा । स देखो। ३एक गन्धर्वका नाम। (शब्दरत्ना०) ४ प्रतीपके एक याह (सं० वि०.) पहिसम्बन्धोप, अग्निसम्बन्धीय । पुत्रका नाम। (भारत १९५४५) ५ कुकुम, केशर । ६ हिंगु, होग। पाय (संपु०) माचार्यभेद । । । वि(स० मध्य०) १ निप्रह। २ नियोग। ३पादपूरण । • बाय (सं० लो०) वाहाते चाल्यते इति वाहि ण्यत् । १ ४ निश्चय । ५ असहन ।६ हेतु । ७ अध्याप्ति। ८ विनि- . यान, मवारो। वह ण्यत् । २ वदनीय, उठा या खींच योग। । ईपदर्थ । १० परिभव । ११ शुद्ध। १२ . कर ले जाने योग्य | ३ वहिः, याहर। ४ पृषक, अलग। अवलम्बन । १३ विधान । १४ विशेष । १५ गति । याही (सं090) पाह्य कन् । '१ घाघ।२ चाहक, १६ मालम्भ। १७ पालन । (शब्दरत्ना० ) उपसर्ग. ... गाड़ी, छकड़ा। . . विशेष, प्र, परा आदि उपसर्गो से एक उपसर्ग । मुग्ध. पाहो कायनि ( सं०९०) पाकका गौतापत्य। वोधटीकाकार दुर्गादासने इस उपसर्गके निनोक्त अर्धा माहाकी (सं० स्त्री०). अग्निप्रकृतिकोटभेद । । लगाये हैं। विशेष। जैसे-विकराल, बिहीन । वैमप्य, . .. (मुन त कस्पस्वा० अ०) जैसे-विविध । निषेध या परीत्य । जैसे,-विमप, वाहोत्य (सं० क्लो०) याह्यस्य भावःस्व। पाद्यका भाव विच्छ। चा धर्म। वि (सं० पु० सी०) याति गच्छनीति वा (वाते दिच्च ! उष्ण पाहायु ति (संपु०) रसका संस्कार विशेष । ३१३३ ) इति इण सवाडित । १ पक्षी, चिड़िया। (को०) • . : .. ... . (सचि० ३ ० ) २ अन्न, अनाज । (शतवा० १४१८।१२।३) (पु.)३ पायस्क (सं० पु०) यहास्कका गोलापत्य । आकाश । ४ चक्षु, नेत्र। पाहारकायन, (सं० पु० ) यायस्कका गोत्रापस्य । यिंदुर (हि० पु.) किसी पदार्थ पर दूसरे रंगके लगे हुए .पाशान्तर (सं०.वि.) १ भीतर और बाहरक।। २ भीतर छोटे छोटे चिड, युदको । , और बाहर। विंश ( स०नि०) पिंशति पूरणे डर, तेलोपः। फासे पाहोन्द्रिय (सं० लो०) बाहामिन्द्रिय । पहिरिन्द्रिय, वोसके स्थान पर पड़नेवाला, पोसा।

पाँची हानेन्द्रियाँ । इन्द्रिय ग्यारह हैं जिनमें से ५वाहा-विंशक (नि.) विंशत्या क्रोतः विशति (विशति विश-

न्द्रिय, ५ अन्तरेन्द्रिय और मन उमयेन्द्रिय हैं। मांस, दम्पावन सायti पा ॥१॥२४) ज्युन (तिविशतेहिं ति । पा . कान, नाक, जोम और स्वचा ये पांच याह्य न्द्रिय तथा ६२४) इति तिलोपःपिंशतिकोत, जो वीसमें खरीदा घाणी, हाथ, पैर, गुदा मीर उपस्य पे पांच अन्तरन्द्रिय | गया हो। हैं। बस आदि पांच इन्द्रियों का काम वाह्य विषयोका | विंशत (स.नि.) योस । ..प्रहण करना है, इससे उनको चाहन्द्रिय कहते हैं। विंशति ( स्रो०) देशपरिमाणस्य पंक्ति विशांति .. . .. . . (भाषापरि०) | निपातनात् सिद्ध पीसको सप्या। २ इसका पाहिक (स.पु.) १ देशमेश, पाहि देश । २ कुकुम, सूचक अङ्क जो इस प्रकार लिखा जाता है-२० (वि०) मगर । ३ हिंगु। ४ स्रोताजन, सुरमा! . . ३ जो गिनती बोस हो। '