पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३०७

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२८१ विशोचरो दशा त्रिकोणस्थ नक्षत्र जानना होगा। जैसे कृतिका नक्षवसे सिवा अन्यान्य प्रहों के दशावर्षको संख्या भी भिन्न प्रकार दक्षिणावर्त और वागायत्तं गणनामें उत्तरफल्गुनी और की है। ५ उत्तराषाढा नक्षत्र दशम या त्रिकोण नक्षन होता है। लिकालदी परामर मुनिने कलिके जोको भाग्य.

अतएवं अब मालूम हुमा, कि कृत्तिका नक्षत्र के साथ चक्रके फलाफलको जानने के लिये एकमाल प्रत्यक्षफल-

उत्तर-फल्गुनी और उसरापाढी, केवल इन दोनों नक्षत्रों प्रद विंशोत्तरी दशाका निर्देश किया है। यद्यपि अष्टोत्तरी "होके त्रिकोण या दृष्टि-सम्यन्धं रहनेसे कृत्तिका नक्षत्रगे, और विंशोत्तरी आदि कई नाक्षत्रिकी दशाफे निर्णयको जिस महकी दशा है, इन वा नक्षत्रों के भी उन्हीं नहीको स्वतन्त्र व्यवस्था है तथापि पराशरके मतसे इस कलि- दशा होगी। कृत्तिका नक्षत्र में रविकी दशाका उल्लेख है, । कालमें विंशोत्तरी दशा ही फलप्रद है। सुतरां दशा- अतएव इन दो नक्षत्रोंकी भी रवि दशा ही जाननी होगी। विचारमें फलाफल निर्णय कर देखनेसे विंशोत्तरी मतसे इनके परस्पर परयत्ती तीन नक्षत्रों में चन्द्रको दशाका । ही देखना आवश्यक है। इस दशाका विचार करनेसे मधिकार है। २७ नक्षत्रों में चन्द्र रोहिणी नक्षत्रमें भव । महादशा, अन्तर्दशा और प्रत्यन्तरदशाको निकाल कर उन. स्थित रहने पर बहुत प्रसन्न रहता है । इसीलिये परा- के सम्बन्ध विचारपूर्वक फल स्थिर करना होता है। शरने रोहिणी नक्षत्रका ही चन्द्रकं दशारम्भक निर्देश किस किस नक्षत्र में किस प्रहको दशा होती है, उस. किया है। का विषय इस तरह निर्दिष्ट हुआ है । पहले ही कहा गया उक्त प्रकार नियमसे ही प्रत्येक तीन तीन नक्षत्रमें है, कि कृत्तिका नक्षत्रसे इस दशाका आरम्भ होता है। महलादि प्रहको दंशा कलियत हुई है। विंशोत्तरी दशाम कृत्तिका उत्तरफल्गुनीनक्षसमें रयिकी दशा होती है, उसका अष्टोत्तरी दशाका मत अभिजित् नक्षत्रसे गणना नहीं को भोग्यकाल व.रोहिणी. हस्ता और धवणा नक्षत्र में ज.तो है और रविसे फेतु तक नवप्रहके प्रत्पेक तीन चन्द्रका भोग्यकाल १० वर्ष, मृगशिरा, चित्रा और घनिष्ठा तीन नक्षत्रोंमे दशाधिकार व्यवस्थापित हुभा है । मष्टो-नक्षत्र में मङ्गलका भोग्यकाल ७ वर्ग; भाा, स्वाति भीर सरी मतसे फेतुकी दशा नहीं है। किन्तु विंशोत्तरी-वशा. शतभिषा नक्षत्र में राहुका भोग्यकाल १८ वर्ग ; पुनर्वासु, के अनुसार संतुप्रहको दशा मानी जाती है। इस विशाखा या पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में वृहस्पतिका भोग्यकाल लिये ही अहोरारी दशाके क्रम के साथ इसका बहुत १६ वर्ष, पुष्या, अनुराधा या उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में शनिका पाक्य है। भोग्यकाल १६ वर्ष; भरलेपा, ज्येष्ठा या रेवती नक्षत्नमें बुध. विंशोत्तरी मतसे रयि मादि ग्रहों की दशा भोगकाल का भोग्यकाल १७ वर्ग, मघा, मूला या अश्विनी नक्षत अर्थात् महादशा इस तरह निर्दिए हुई है, रविकी महादशा| केतुफा भोग्यकाल ७ वर्ण है। पूर्यफाल्गुनो, पूर्यापाढ़ा का भोगकाल ६ वर्ष, चन्द्रका १० वर्ष, मङ्गलका ७ वर्ष, | और भरणी नक्षत्रमै केतुका भोग्यकाल २० वर्ष हुमा राहुका १८ वर्ष, वृहस्पतिका १६ वर्ष, शनिका १६ वर्ष, करता है। धुधका १७ वर्ष, फेतुका ७ वर्ष, शुकका २० वर्ष कुल १२० ___ इन महादशामोंका निर्णय फर पोछे अन्तर्दशा- वर्षौ देशाफे भोगका अन्त होता है। इससे इसका नाम | का निश्चय करना चाहिये । जातकका जन्म समय स्थिर ' विंशोत्तरी हुमा है। परन्तु इसमें अष्टोत्तरी दशाकी तरह कर तत्कालिक नक्षत्र का जितना दण्ड गत हुमा हे, मक्षत्र-संख्या अनुसार दशाका घर्ष विभाग कर भोग्य, उसका ठीक कर इस दशा भोग्यवर्णका भाग कर पशा निकाली नहीं जाती। इसमें प्रत्येक नक्षत्र में ही पूर्ण भुक्त भोग्यकाल निर्णय करना होता है। नशनमान दशाका भोग्यवर्ण धर कर गणना करनी होती है। इस साधारणत: ६० दण्ड है। एक मनुष्य का एत्तिका नक्षत- समय मालूम हुआ है, कि भोत्तरी और विंशोत्तरी दोनों में ३० दण्डके समय जन्म हुआ । पृत्तिका नक्षत्र मतसे ही रविसे मङ्गाल तक ये तीन दशामाम परस्पर ऐषय रविको दशा होती है, उसका भोग्यकाल ६ वर्ग। यदि हैं, इसके बादसे ही व्यतिझम हुमा है। रवि और बुधके । समूचा कृत्तिकानक्षतमे भर्यात् ६० दण्डम ६ वर्ष भोग Vol. XXI. GG.