पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३२५

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विक्रमयाहु-विक्रमादित्य २७७ रामपालके सिवा इस परगनेमें केदारपुर नामके स्थान- विक्रमसाही-वालियरके तोमरवंशीय एक राजा, मान- में द्वादश भौमिकोंके मन्यतम चांदराय और केदाररायका साहीफे पुत्र । आप १६वीं सदी में विद्यमान थे। ... सुबहत् ध्वंसावशेष गङ्गा और मेघनाके संगमके निकट- .. ___ ग्याशियर देखो। का मठ देखनेको चीज है। विक्रमसिन्द-सिन्दवंशीय येलदुर्ग. एक सामन्त राजा. • फिरङ्गीवाजार इच्छामती नदीके किनारे पर घसा २य चामुण्डराजके पुत्र । १९०२ शकमें भाप कलचुरि- हुआ है। गयाव सायस्ता खाके जमाने में सन् १६६३ ई०. पति समके साधीन विसुकाई प्रदेशका शासन करते में कई पुर्शगाली फिरङ्गी भाराकानी राजाको त्याग कर | थे। 'मोगलसेनापति हुसैनयेगका पक्ष ले यहां रहने लगे। विक्रमसिंह-पक पराकान्त 'कच्छपघातयंशीय राजा, .इसीसे यह स्थान फिरङ्गी दाजार नामसे प्रसिद्ध है। एक विजयपालके पुत्र । अद्वितीय जैनपण्डित शान्तिपेणके समय यह स्थान कस्वाफे रूपमें था, किन्तु इस समय | , पुत्र विजयकीर्ति इनके सभा-पण्डित थे। हुसकुएडसे एक सामान्य छोर। गांय सा दिखाई देता है।' । ११४५ संवत्में उत्कीर्ण इनको शिलालिपि पाई गई है। ! फिरङ्गोवाजारके प्रायः तीन मील दक्षिणमें इच्छामती | ताविक्रमसिंह-पप्पराववंशीय मेवाड़ के एक प्रसिद्ध राजा। के किनारे और एक प्राचीन स्थान है। यहां मीरजुमलाने | समरसिंहफे पूर्वपुष्प । समरसिह देखो। एक चौकोन किला बनवाया था। उस प्राचीन दुर्गके विक्रमादित्य (सं० पु०) मोदकविशेष । प्रस्तुत-प्रणालो- भग्नायशेपमें कितनी ही है और घाट हैं। पहले मोगलों पहले २० गुन्दफलको घृतमें पाक कर पीछे उन फौंको फे जमानेमें यहाके घाटमें शुल्क यो कर यसूल किया | निकाल कर बोस पल बाडमें डाल दे । इसके बाद साल. जाता था। इस समय कारके महीने में यहां एक मेला मूली, तुरंगो, सोंठ प्रत्येक ४ तोला, जातीफल, कझोल, लगता है। यह १५ दिनों तक ठहरता है। इस मेले में लवंग, प्रत्येक २ तोला, मालता, कुलिञ्ज, फवाय, करमत्वक पूर्वपङ्गालके बहुतेरे पालो पाते हैं। इसमें पूर्व पङ्गोय प्रत्येक १ तोला, इन्हें एकल कर मोदक बनाये । प्रति दिन उत्पन्न यस्तुभोंका क्रययिक होता है। यदि १ तोला मोदक और एक घृतपपब मामलको सेवन विक्रमबाहु (सं. पु०) सिंहलके एक राजा। करे, तो धातुक्षीणता, अग्निमान्ध, सभी प्रकारफे नेतरोग बिफाराज (सं० पु०) राजा विक्रमादित्य । कास, श्वास, कामला गौर बोस प्रकारफे प्रमेह मति विक्रमशील (विक्रमशिला)-पालराजामौके समय मगध । शीघ्र नष्ट होते हैं। । को दूसरो राजधानो। गाज फल इसे शिलाय कहते हैं। | विक्रमादित्य, (सं० पु०) स्वनामप्रसिद्ध : नरपति । ये यह वर्तमान विहार प्रदेशके मध्य विहार महकमेसे प्रायः विक्रमार्क नामसे भी यिषपात है । इस नामक पसंख्यक ३ कोस दूर पर राजगृह जानेके रास्ते पर अवस्थित है। गृपति यिभिन्न समयों में उत्पन्न हो कर राज्यशासन कर बौद्ध पालराजामों के समय यह स्थान बहुत समृद्धिशालो गरे हैं। उनमें संवत्सरप्रय विक्रमादित्यको हो वात था । भनेको मठ और साराम शोभा दे रहे थे। पर आज पहले कहेंगे। इन नृपतिके सम्बन्ध प्रयाय या किम्म. उनका नाम निशान तक भी नहीं है। यल दो एक दन्तियोंके माधार पर कितने ही लेखकाने कितनी ही माचीन बौद्धमूर्तियाँ उस क्षीण स्मृतिका परिचय दे रहो । हैं। यहांका राजा आज भी विहार भामें. प्रसिद्ध है। बातें लिखो हैं, पहले हम उन्होंको गालोचना करते हैं। ___धर्मपाल के वंशमें विक्रमशोल नामक एक घोरपनने कालिदासके ज्योतिर्विदाभरण नामक प्रायमें लिखा जन्म लिया। कुछ लोग कहते हैं, कि उन्होंके नामा | नुसार विकाशील राजधानीका नाम पड़ा होगा 1 इन्हों। : "श्रीरिकमार्क निस्मृति विचारविशारद पण्डितोंसे विक्रमशीलके पुत्र युवराज हारके माधम में रह कर समाकोर्ण एक सी अस्सोसे अधिक देशोसे समन्वित प्रसिवि गोभिनन्दने रामचरित मादि' काव्योंको भारतयक मन्तर्गत मालय देश के राजा है। महायाग्मी घर रचना को।.. .... ! रुचि, मशुदत्त मणि, शकु, जोगीपापरायण त्रिलोचनहति .rol. xxI, TO