पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३२७

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विक्रमादित्य २७६ भारतको प्रायः सभी देशी मापामो में अनुवाद हो चुका मालवमें प्रयाद है, कि राजा विक्रमादित्यने पितासे है। किन्तु भालोचना करने पर पे ऐतिहासिक अन्य राज्याधिकार नहीं पाया था। उनके पैमाने य भ्राता कोई सात आठ सौ वर्षसे अधिक पुराने न होंगे। इसी | अर्थात् सौतेले भाई भर्तृहरि हो मालपका शासन करने तरह ज्योतिर्विदाभरणकार फालिदासने अपनेको विकमार्क थे। किसी समय भर्तृहरिके साथ विक्रमादित्यका के समसामयिक होनेका परिचय देने की चेष्टा को है सही; | मनोमालिन्य हुमा, इससे विक्रमादित्य नत्यन्त सुपण हो किन्तु मालूम हुआ है, कि यह अन्य सन् १२यी सदोकी | मालव छोड़ कर चले गये और होन दोन मेपमें गुज- रचना है। सुतरां इन आधुनिक प्रन्यों पर निर्भर करके, रात गौर मालवाके नाना स्थानोंमें परिभ्रमण कर कुछ दो विक्रमादित्यका इतिहास लिमना समोचीन नहीं। दिनोंके वाद मालव हो लौट आये। इधर मत्त हरि होगा। स्वपत्नीको दुश्चरित्रतासे विरक्त हो कर राजभोग त्याग . ज्योतिर्विदामरणकारने जो कई उज्यल नक्षत्रोंका। कर जङ्गलमें चले गये। उन्होंने वाचा गोरखनाथजीके परिचय दिया है उन महात्माओंके सम्बन्ध में मेरा कहना। शिष्य हो कर योगमें मन लगाया ऐसो अवस्था विद्यमा. है, कि ये विक्रमादित्यके समसामयिक ही थे और दित्यको राज्यका भार लेना पड़ा। राजा होने के इसमें मो सन्देह है, कि वे लोग परस्पर एक समय के थे वाद विक्रमादित्यने भारतवर्षके कितने ही प्रदेशीको जीत या नहीं । युद्धगयासे बौद्ध समरदेवकी एक शिलालिपि./ कर अपना राज्य-विस्तार किया। भाविष्कृत हुई थी। उस शिलालिपिके पढ़नेवाले विल. । उद्धत अन्य निचय और प्रशादसे में जिन कवियों शिस साहयक मत यक्ष श्यो'शताव्दीकी लिपि इसमें तथा पण्डितोंका परिचय मिलता है, वे विभिन्न समयके कालिदासके सभासद और नयरत्नका भी उल्लेख है। मालूम होते हैं। पररुचि भत् हरि भादि शब्द देखो। यह भी हो सकता है, कि सम्भवतः इस तरहकी किसी पाश्चात्य पण्डित लोग कालिदासके बनाये रघुवंशमें लिपि और प्रधादसे हो पिछले कालमें विक्रमादित्यकी/ 'हण' शम्द देख कर अनुमान करते हैं, किणके अधि. समा और उनके नवरत्नको वात प्रचारित होगी। कारकालके यादके पे कालिदास हैं। उनके मतसे गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त के समय खुष्टीय ५ो शताब्दीमें द्वारा रचित है। मूल पात यह है, कि सिंहासनवतीसो और हूणोंने भारत पर आक्रमण किया था। इसी तरह विका येतामपचीसी इन दोनों पुस्तकोंक रचयिताके नमः तथा । मादित्यके सम्बन्ध में भी ये कहते हैं, कि ज्योतिविदामरण तारीखका ठोक पता नहीं है। किन्तु बेतालपचीसीको भाग.] के मतसे या संपत्के भारम्भानुसार विक्रमादित्य खष्ट- को देखने या .इस घातका की . पुस्तकोंमें उरलेख | पूर्व प्रथम शताम्दोके मनुष्य कहे जाते हैं सही, किन्तु रहनेसे यह अनुमान होता है, कि यह रचनाकौशल समिदेव. हम लोग ऐसा स्वीकार करने में असमर्थ हैं। क्योंकि का ही होगा। क्योंकि उनको भनाई पुस्तक कथासरित्सागरकी प्रथम मदके समकालीनका कोई अन्य नहीं मिलता। भाषासे इस बेतालपचीसीको मास पहुत कुछ मिलती जुलती है।। और तो क्या, गो विक्रमस यत् प्रचलित है, यह गृष्टीय इससे यह अनुमान - युक्युिक्त नहीं कहा जायेगा। यह सोमदेव लो शताग्दी तक इस नामसे प्रचलित नहीं था। इस भट्ट सन १२वीं शताब्दीमें कारमीग्में उत्पन्न हुए थे। ज्योति समय पूर्ण यह माद 'मालयगणस्थित्यम्द' कह कर हो विदाभरपके रचयिता काशिदासके मो इसो समयके रोनेका मनु प्रथित था। और ता पया, यह माद इस समय १९८७ मान किया जाता है। उन्होंने अपने प्रन्यका भारम्भ कान तक प्रचलित रहने पर मी ७१४ विममस यतफे (६५७ , कलिशताब्द ३०६ या २४ विकममवत् शिखने पर उनके प्रत्यमें छुटान पहले) विक्रमाप्दाहित कोई शिलालिपि, तान. "शका राराम्भोधियुगो (४५) नितो हतो मान" इत्यादि शासन या प्राचीन प्रग्य नहीं मिले हैं। चोनरियाजक धचनोंसे ४५यक मौर 'मत्वा' परामिदिरादि मतेः' इत्यादि) हयुयान सियारफे भारतन्त्रमण-काल में शिलादित्य उक्ति द्वारा भी उनका मान पकड़ा गया है। वराहमिहिर देखो।। मालयका राज्य करते थे। इनफे पिताका नाम था--.