पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३२९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विक्रमादित्य । २८१ प्रतिष्ठाके समयमै 'विक्रमर्सयत्' या 'मालवगणाब्द' या। कल्पसूत्र टोकामें देखा जाता है, कि राजा विक्रमादित्य मोलवेश संवत् प्रचलित हुआ। शनुजय देखनेके लिये गये, यहां सिद्धिसेन दिवाकरने ' प्रबन्धचिन्तामणि, हरिभद्रको आवश्यकटीका और उनको जैनधर्ममें दीक्षित किया | सिद्धिसन के उप. नोंके तपागच्छपद्यावलोसे जाना जाता है, कि वीर | देशसे विक्रमादित्यने संवत्सरका प्रवत्तंन किया। इससे ' निर्वाणके ४६७ वर्ष वाद पादलिप्ताचार्य, सिद्धिसेन- | पहले बीर-संघरसरका ध्यवहार हो था। दिवाकर और चोर-निर्याणके ४७० पर्श पाद (ईसाफे | . यह मालूम नहीं होता, कि विक्रमादित्यने कितने ५७ वर्ष पहले) संवत् प्रवर्तक विक्रमादित्य माविर्भूत | दिनों तक राज्य किया। इसमें सन्देह नहीं कि उन्होंने हुए था उन्हान उजायनोके शकराजको हटा कर बहुत दिनों तक राज्यशासन किया था और इसलिये सिंहासनारोहण किया । उनको संवत्सर-प्रवर्त्तन तथा मालवमें कई समाज. • • जैनोंको कालकाचार्य-कथामें लिखा है, किशकश | संस्कारीको सुविधायें प्राप्त हुई थी; किन्तु यह नहीं मालूम भी जैन-धर्म का उत्साहदाता और अनुरागी था। उनके होता, कि दीर्घकाल तक शासन करनेके बाद उनके संमयम हो मालवमें विक्रमादित्यका अभ्युदय हुआ| सिंहासन पर उनका कोई घंशधर बैठा था या नहीं, था। उन्होंने शकशका ध्वंस किया। उनका राज्या- क्योंकि इनके एक घमें हो उज्जयिनोका राजासन पर धिकार समृद्धिसे पूर्ण और गौरवजनक हुआ। उन्होंने | शकोंका कब्जा हो गया था। अपने नामसे सवत् प्रचलन और सारे राज्यके अघि राजवश भौर शकान्द' देतो। पासियों को ऋणसे मुक्त किया। कुछ दिनों के बाद ही , विक्रमादित्यके घंशलोप और शकाधिकार हो जाने फिर शक राजा देख पड़े। उन्होने विक्रमादित्यके घंश- पर मालयाके अधिवासी अपने जातीय संपत्सरकों का 'स किया था । नययिफ्रमादित्यक १३५ वर्ग बहुत दिनों तक चला नहीं सके। इसाको चौथी शतादी. बीत जाने पर उसके बदले में उस शकराजने शंकाद- के आरम्भ तक शकाधिकार पूर्ण रूपसे विद्यमान था। प्रयर्शन किया । जैनाचार्य सुन्दरोपाध्याय द्वारा रचित २ विक्रमादित्य। __ चीनपरिमाजक ा यान सियाङ्ग भारत भ्रमण-

  • मानवसे माविष्कृत विभिन्न समयकी शिलाशिपियों में 'मालव

कालमें किन गया है, कि युद्ध-निर्वाणके सहन्न वर्ग में काम' 'माझवेश संवत्सर' और 'भाजगप्यस्थित्यम्द' इत्यादि धावन्ती-राज्यमें विक्रमादित्य नामको एक बहा ध्यालु गाम पाये जाते है । जैसे:- राजा था। यह नित्यं गरीब और असहाय लोगोंको ... . ५ लाख सोनेका सिका वांटता था। उसके अत्यधिक (३) मालवानो गणस्थित्या याते शतचष्टनुपे। . . निवत्यधिकेऽ ऽदानां भूतौ सेव्यधनस्यने ।" . . दानसे खजाना खाली होनेके भयंसे कोपाध्यक्षने एक ..... ... .(पन्धुवर्माको दशपुरलिपि ) दिन राजासे कहा कि राजकोष शून्य हो जाने पर उसमें धन सलनेफे लिपे जो अपिरिक कर लंगोया

=४६३ मानपाद = ४३६६: । ( Fleet's.Gupta

जायेगा, उस फरमारस दरिद्र प्रजा कर पायेगी । Kings, page 8s:).. दानके लिये आपकी प्रशंसा होगी सही, किन्तु माप (२.) यत्सरशतेति: सपननवत्यागः ।। अपने मन्त्रियों की दृष्टि में गिर जायेंगे। राजा विक्रमा. तिर्माक्षवेशान मन्दिर पुन्ज टेः तम् ।" दित्यने फोपाध्यक्षको पात पर ध्यान नहीं दिया और कनभ्यलिपि । (Indian Antiquary. Vol XII. 162)

' (२) मानवकाशाच्छरदा पत्रिशतसंयुतेभ्यतीतेषु नवसु "सिद्धसेनेन विक्रमादित्य नामा राजा प्रतियोपिया......

शतेपु-( Archaeological Survey of Indin. Tol, श्रीपरि सान्निध्यादिप्रमादित्या रामा यस्सर मपयामास X Pr33.) पूर्वस्तु भी वोरसंवस्तरमासीत ।” (पमुपटीका) Vit, TITA