पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३३३

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विक्रमादित्य २८३ शे चन्द्रगुप्तका जन्म हुआ। ये भी पिताकी तरह दिग्वि | नामक एक दिगन्तविश्रुत कयि अवस्थान करते थे। जयो थे पे बड़े तेजस्वी, विचक्षण अभिनेता, मुशास:- मातृगुप्त के अन्यान्य साधारणगुणका परिचय पा कर राजा और परम धार्मिक थे । समुद्रगुप्तने उत्तर और दक्षिण विक्रमादित्यने उसको काश्मीर राज्य प्रदान किया । इन भारत जय किया था; पर उनके मरते ही प्रान्तीय सीमा- विक्रमादित्य के पुत्र प्रतापशील शिलादित्य हैं। चीनपरि- के का राजामीने गुप्तवंशको अधीनता मस्सोकार कर दी। याजक हयूनसियाङ्गलिस गया है, कि उनके मालयामें 'श्य चन्द्रगुप्तने गद्दी पर बैठते ही एक मोर गङ्गापारकी यह उपस्थित होनेसे ६० वर्ष पहले यहां शिलादित्य प्रयल. भूमिका और दूसरी ओर सिन्धु नदीका सप्तमुख विदीर्ण प्रतापसे राज्य करते थे। पुराविद फागुसन योर कर वागियों का दमन किया था। मालपमें शकाधिकारके अध्यापक मोक्षमूलरके मतसे उक्त विक्रमादित्यके नाम लोप होने पर भी उस समय तक सुराष्ट्र यरीमान काठिया पर हो यथार्थमें संवत् प्रवतित हुमा । उनके यथार्थ मन्द. घाइमें शकशनपगण बहुत पराकान्त थे। गुप्तसन्नाट के ६०० वर्ष पहलेसे उनको अब्दगणना चलने लगो। किंतु २२ चन्द्रगुप्तने मालय और गुजरात होते हुए अरब समुद्र हम पाश्चात्य पण्डितोंके इस मतको समोवीन नहीं कह की वीचिमाला विक्षोभित कर शकशनपों को मूलसे नष्ट | सकते हैं । (विक्रमादित्यके सम्बन्धमें आलोचना कर दिया। ये शकवंशफे उच्छेद कालमें ३८८ से ४११ | द्रष्टष्य) ० तक बहुत घर्ष तक महासमरमें लिप्त थे । इस कालमें ] . पाश्चात्य पण्डितोंके मतसे ५३०.५४० ६०में हर्ष . उन्होंने जिस तरद गसाधारण वीरत्वका परिचय दिया विक्रमादित्यका राज्यारम्म है। था वीरोंने उससे विमुग्ध हो कर उनको 'विक्रमादित्य' विक्रमादित्य । . भाख्यासे विभूषित किया था । पास्तविक दम सातपों सदी के प्रारम्भमें काश्मीर में भी विक्रमादित्य घोये विक्रमादित्यके हाथसे ही शकक्षत्रपकुल | नामक एक पराक्रान्त नृपति राज करते थे। उनके पिता. एक ही बार नष्ट हुमा था। इसके बाद भारत के इति. का नाम रणादित्य था। उन्होंने यभिमेश्वर नामक एक दासमें गौर शकराजाओं का नामोनिशान भी नहीं। शिवलिङ्गकी प्रतिष्ठा को थी। उनके- ग्रह और गलून मिलता। इस, चौथे विक्रमादित्यके समयमें गुप्ता नामफे दो मन्त्री थे । ब्रह्मने अपने नाम पर प्रहमठ और साम्राज्य इतनी दूरम फेला था, जि. पाटलिपुत्र में रह कर गलूनने अपनी पती रतावलोके नाम पर एक विहार बनवाया था। विक्रमादित्य ४२ वर्ष राज्य भोगकर सारे साम्राज्य पर शासन करना कठिन हो गया था। इस कारण उन्होंने गयोध्यामें अपनी राजधानी हटाई । अपने कनिष्ठ यालादित्यको राज्य दे गपे । कारमीर देखो। . .. ७ विक्रमादित्य । . . किन्तु फिर भी, पालिपुत्र (पटना) की महासमृद्धि यादामीफे प्रसिद्ध प्रतीच्प चालुपयशमें विक्रमादित्य और जनताकी पृद्धिमें कमी नहीं हुई। इस समय चीग परिग्राजक फाहियान गुप्तराजधानीको ऐन कर उभ्यल नामके एक नृातिने जम्मप्रहण किया था। ये घोर. मापामें उनका परिचय दे गया है। घर रे पुलिफेशी पुत्र और प्रतीज्य चालुफ्पयशफे प्रधम विक्रमादित्य कहलाते है। उनके मोर नाम है- .. ५ विक्रमादित्य । सत्याधप मोर रणासिक । प्रायः सन् ६५५०में इनका राजतरङ्गिणोके पढ़नेसे मालूम होता है, कि गभिषेक हुआ था। पुलिफेशीको मृत्यु के बाद पल्लय, . काश्मीरमै प्रयरसेनके अभ्युदयसे पहले उज्जयिनीम विक्रमादित्य नामसे एक राजा राज करने थे। ये हर्ष चोल, पाएडय और फेरलने विद्रोह गया दया था। और तो क्या पल्लयपति परमेश्वर के ताम्रगासनसे मालूम विक्रमादित्यके नामसे इतिहासमें प्रसिद्ध है। इन्होंने होता है, कि उनके भपसे विक्रमादित्य पहले भागने पर गाम्लेच्छोंको पराजय कर सारे भारतवर्ष पर अधिकार बाध्य हुए थे। किन्तु उन्होंने थोड़े दो दिनों के बाद कर लिया। पे असाधारण सुश्तमान, हानी मौर शलमों पर शासन स्थापित कर विक्रमादित्य नामका गुणियोंका माध्रयस्थान ये । इनकी समामें मातृगुन | अर्थ सार्थक किया। (चालुक्य शम्दाम