पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३३४

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२८१ विफगादिस्य . पिकमादित्य पर अधिकार कर लिया। उन्होंने ८४७मका में प्रा. प्रतीरुप धालुफ्यराज विजयादित्यफे पुत्र और एक मात्र पालुपपराज भोग किया था। चाप देखो। विक्रमादित्यका नाम पाया जाता है। ये प्रती चालुफ्य. १० विक्रमादित्य । - . . यंग २रे विक्रमादित्रकै नामसे प्रसिद्ध हैं। ७३३से १३० काटके ताम्रशासन में प्रतीच्य बालपप यं 4290 तक पादामीके सिंहासन पर ये अधिष्ठित थे। ताम्रशासनदाताका एक विक्रमादिश्य माम माmiki उग साम्रगासनो लिया है, कि उन्होंने राजपद पर राजा सत्याधयफे भतीजे ( उसके भाई दायांक पुर मधिष्ठित होने हो अपने पितृवैरी पक्लयपति नन्दीपोतको उत्तराधिकारी हुप। कुछ लोग इन भूपतिको प्रतीक पगाफे विरुद्ध भग्न धारण किया । तुदाक नामक स्थान. घालुपयशफे पांच विक्रमादित्य करते हैं। .. में दोनों मोरसे युदमा । पर वपति हार कर भागे। किन्तु मसतस्पषिषु भाएहारकर इनको पूर्णतम चार युग्रजपफे साथ यिकमादित्यने मणिमाणिषय, हाथियों, गंशीय न कह कर दूसरों शाखा और पिछले प्रोक घोड़ों और रणपाद्ययग्नों पर अधिकार कर लिया। चालुपप शफे रम विक्रमादित्य कहते हैं। उनके मत इसके बाद उन्होंने काचो पर नाकमण किया मही; किन्तु ६३० शफ (१०८६०) में राजाका अभिषेक हुआ। हम इस प्राचीन तीर्थरधानको उन्होंने नए नहीं किया। परं १४६ शकमें खुदी ताम्रलिपिसे मालूम होता है। उन्ही यहांके दोग दरिद्रों भौर घ्राक्षणों को यहुत घन प्रदान किया | प्रमिलपतिको पराजित, चेरोका प्रभाव समोरगा था मोर रामसिंघेश्वर और अन्यान्य देवालयोका लोगों- फोहणका सर्वस्व अपहरण कर उत्तरको गोर कोल्हापुर द्वारसाधनपूर्वक इसे व्यर्णमण्डित कराया था। इसके बाद रनमा सदा किया | ११२ शाके तक इनफे रामस्वर घोल, पाल्प, फेरल और फलसफे साथ ये संग्राममें लिप्त उल्लेख पाया जाता है। दुए। इसके बाद उन सीने उनको अधीनता स्वीकार कर लो। उन्होंने हैदपांशी घो राज-कन्यामोंका पाणिग्रहण किया था। उनमें स्पेठा लोक महादेयोने (कलागी 5 विक्रमादित्यकै प्रस्तामें मतीच्य चानुश्ययशोय । जिलाफ अन्तर्गत पट्टडकल नामक स्थान) लोकेश्वर पिफमादिश्यका परिचय दिया गया है। इन रे विक माविम मापसे शियमन्दिर और कनिष्ठा'लोषपदादेयाने बैलो-भातृशमें रे मोर श्ये विक मादित्यका नाम मिलता है । पपेश्वर नामसे दूसरे एक शियमन्दिरको प्रतिष्ठा की थी। यिक मादिराय " . इन छोटो रानीफे गर्भसे उत्पन्न होनेवाले कोरिया रामायिकमादित्य उत्तराधिकारी हुए। यह किम शेष रे विक मादित्य थे, फिर भी इन्होंने जगदेवालयका संस्कार और विजय शर्मा - पण्डित गामक एक अनाचार्धाको शासन-पान किया धा! सहप . ' . विक्रमादित्य। रे पिक मादित्य मान्य नालुपपदांशमें दो विक्रमादित्यफे नाम मिलते (अय्यन कृष्णराजका दामार) हैं। इनमें एक 'युवराज' उपाधिसे विकषित थे। यह गुपराज थिममादित्यफे पुर्व प्रथम चालुका भोग भोर पत्रिक मादित्य . चालुपए मोरके पुत २१ विमामादिप है। युग्रराज (पेदिराज समयके दामा पिममादित्यफे भतीजे ताप. भापायपूर्वक बालक मिजास्पिको रायम्युन कर घालुपपराज प्रक्षण करने . . मी ४ विक मादित्यका विशेष परिषय न मि पर धेरोक्त विप्रमादित्य फिर उसको हराकर सिंहासन पर विशेष ना निता गया। . . . . . .