पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३३७

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२५६ विक्रमादित्य-विक्रमोपाख्यान .' . .: । . १४ विक्रमादित्य । . . . . • पृद्धि हुई । उसीके साथ दाऊदको स्वाधीन होनेको इण्या • मेवाड़ के प्रप्पराय शोय एक राणा। राणा संग्राम | भी बलवती हुई। कुछ ही दिनके बाद उसने दिल्लोके वाद- सिंह पुत्र विक्रमादित्य नामसे विख्यात ये सही; किन्तु | शाहको गधीनता तोड़ स्वाधीन हो जाने की घोषणा कर • यह नामके गुणके पूर्णतः गयोग्य थे। सन् १५६१ विक्रमी दी। बादशाहको जगह अपने नामका फत्क्षा पाठ • या १५३५ ई में इन्होंने मेवाड़ के सिंहासन पर गारो करनेका आदेश दिया। इसको दण्ड देने के लिये मोगल. हण किया । 'इनको अदूरदर्शिता और प्रजापीड़नसे पाहिनियां दिलोसे चली। युद्धका आयोजन देन कर "सभी इससे नाराज रहते थे। इसका यह गुण-गौरय विक्रमादित्यने दाऊदसे कहा, कि इस मशान्तिके समय चारों ओर फैल गया। • फलतः गुजरातके सुलतागने | जानेको कहो' सुरक्षित स्थानमे घर देना चाहिये । इस मेवाड़ पर चढ़ाई कर दो। चितौर-रक्षा करने के लिये परामर्शके अनुसार नजाने में जो बहुमूल्य धनरस्त सोना बताने जोयन.उत्सर्ग किया। किन्तु सामन्तीको चेष्टा | चांदी होरा जवाहर था, सब नाबमें लाद कर पशोहर . भोर हुमायूके मानेको खबर पा कर सुलतानकी दाल न | स्थानमें पहुंचा दिया गया। इधर मोगल पठानों में घोर. गलो। यह अपनासा मुंह बना कर लौट गया। इस तर कई युद्ध हुए। मरतमें दाऊद फेद कर लिया गया। • दारुण पैदेशिक माफमणसे जीव वाचा। किन्तु उसका | सारा गौड़ या फिर एक बार दिलीके यादशाहके शासना अस्वभाष किसी तरह शान्त न हुभा । उसने एक समा धीन हुआ। राजा टोडरमल का ही अधीनतामें शाही फौज के बीच अपने पिताके जोयनदाता अजमेरके करोमचांद आई थी। राजा रोषरमलने देखा, कि विक्रमादित्य ' का अपमान कर दिया। इस पर सामन्तोंने उसको राज्य भौर जानकीवल्लम ये दोनों चतुर और कुशलो है, इससे युत कर पनवोर यहादुरको सिंहासनारूद कराया. उन्होंने इन दोनों को ही जचा पद दिया। उनकी कार्य . . . . . १५ विकमादित्य . . फशलता पर मुग्ध हो कर.. पादशाहसे उनको सन' - यङ्गालफे गद्वितीय धोर प्रतापादित्यफे पिताका नाम दिलवा दी, इसी सनदके वलसे विक्रमादित्यको यशोहर. . विक्रमादित्य है। बङ्गज कुलाग्यो यर्णित है, कि गुह के पश्चिम गहासे ब्रह्मपुत्र के किनारे तक फैली हुई छांशमें रामचन्द्रका जन्म हुगा। यह भाग्य परीक्षाके | जमान्दारी प्राप्त हुई। प्राचीन यशोदरमें उनके बहुतेरे राम लिपे वाणिज्यकेन्द्र सप्तग्राममे चले आये । यदा रामचन्द्र के प्रासाद बने । नानाविध पुण्यजनक कार्य करके यह गौड़ तीन पुत हुए-भवानन्द, शिवानन्द और गुणानन्द । बट्ल में विख्यात हुए । विक्रमादित्य राज्यकार्यफे उपलक्ष्य. कुछ दिन याद सौभाग्यफमसे रामचन्द्र गौड़ दरवारमें में गौड़में हो रहते थे, किन्तु उनके भाई यसरतराय या किसी उच्च पद पर मधिष्ठित हुए । उनकी मृत्यु पर भवा-1 . उनके पुत्र प्रतापादिव्य यशोहरके राजप्रासादमै रहते थे। गादने अपने पैतृक पद पर अधिकार किया। भयानन्द सन् १५७५ ई० में जो महामारो हुई थी, उसम गौड़ भोहरि तथा शिवानन्दफे जागकोवलम एक-एक पुत्र - राजधानी धाम्रए और जनशून्य हो गई। इस पर विक- मादित्यने गौर या भन्यान्य जगहसि मनुष्याको युला कर हुए। श्रीहरि और जानकीने थोड़े हो समयमें नाना पशोहरमें उन्हें बताया था। मन.पादित्य शब्द देखो। भाषागों तथा अस्त्र-शस्नमें नैपुण्य लाभ किया। लड़कपन. मादित्यचरित (स ) यिमचरित। -से ही दोनों गोडाधिपके पुत्र क्यालिद और दाउदपे. साथ विमा (स.पु.) विक्रमादित्य देखो। पेलते थे। मोति के साथ साथ उनकी परस्पर मित्रता | किमिन् (संपु) विक्रम देखो।' मुहः हुई । उसो मिसताफे कारण जव दाउद गहा पर येठा विकमा ( पु.) १ विष्णु। २ सिंह, शेर। (नि.) सा उसने भादरिको 'विक्रमादित्य और जानकोवलम भगिय शक्तियिनिए यिक मयाला, परमी । ४ को 'वसन्त रायका निताव ६ कर अपने प्रधान मन्तो विकमसम्बधी, चिकमका। जैसे,पिक मी संवत् । . बना लिपे। दोनों भाइयोंके उद्योगसे गोहराज्य में सुशः विक मोपाख्यान (स. सो.) पिक मम्प उपाषानं । इला स्थापित दुई भार गौढ़ राजकोषको भी यथेष्ठ ,विक मचरितः । . rol. xx] 73