पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३५९

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- जिपिन-विनयचूर्गा ३०७ विजपिल ( सं ० ) पङ्क, कोचड़। .. । यिजयक (सं० वि०) विजये कुशला विजय-कन् । यिजेता, विजय ( स० पु० ): वि-जि-माये मच्। १ जय, जोत, सदा जीतनेवाला। पराजयका Ter 1 हिन्दी में इस शम्मका ध्यपहार स्त्री विजयकएटक (स. पु०) पिनपे वएटक घ । विभय. 'लिङ्ग होता है। २ अर्जुन । अर्जुनके अनेक नाम विघ्नकारो, वियों बाधा देनेयाला । . हैं जिनमें से एक नाम विजय है। महामारतकं विराट- विजयकुचर (संपु०) विजयाय या कुस १राज. 'में लिया है, कि विराट राजकुमार उत्तर जप गो रक्षाके | वाह्य हस्ती, राजाको सवारीका हायो। २ युद्धहस्ती, निपे कोरयों के माप युद्ध करने गये, तब अर्जुन वृह- लडाईके मैदान में जानेवाला हायो।। नलारूपमें उनके सारथी हुए थे। कार्यगति देख कर | यिजयतु ( स० पु.) १ विजयध्वजा, जयपताका । गृहन्नलाने उत्तरको अपना परिचय दे दिया । उत्तरने | २ राजपुत्रभेद। ___पर्जुनके सभी नामोंको सार्थकता पूछो। अर्जुनने विजयक्षेत्र ( स० क्लो०) १ विजयस्थल। २ उष्टीसाफे अपने अन्याम्प नामको उत्पत्तिका परिचय दे कर इस | अन्तर्गत एक प्राचीन स्थान । विजय नामका ऐसा अर्थ लगाया है,-"मैं रणदुर्गदविजयगढ-युक्तप्रदेशफ अलीगढ़ जिलान्तर्गत एक कृषि. 'शान में नामोंके संग्राममें जाता है, किन्तु बिना उन्हें । प्रधान नगर । भूपरिमाण ४१ एकर है। यह अली. .परास्त किये लोटता नहीं . इसीलिये सोंने मेरा नाम गठ शहरसे १२ मोलको दूरी पर अवस्थित है। यहां विजय रखा है।" स्कृल. डाकघर गौर एक प्राचीन दुर्ग है। इनफे सिया । यिरुपात-विजय-नाटकमें बड़ी ही मार्थकताफे साथ कर्नल गाईनका स्मृतिम्तम्म भी दिखाई देता है। गर्जुन विजय नामका उल्लेग्न देखने में आता है। विजयगुप्त--पूजयङ्गफे एक प्रसिद्ध कथि। पापुराण या कोमये तोङ्करके पिता। ४ जिनपलभेद, जैनों फे शक्लयों में से एक। ५धिमान | ६ यम । कालिकफे। गनसाको पांचाली रच कर ये पूर्णयहमें बहुत प्रमिन पुत्र। ( कल्किपुराण १३.५०) हो गये हैं। . ८ भैरपयंशीय पहाराजपुत्र । पे काशीराज नाममे | विजयचन्द्र-कारलीजफे राजमेद। कनौज देखो। विष्पांस थे। प्रसिद्ध बागडययन इन्होंने ही लगवाया | विजयचक (सलो०) विजयाय ममम्। ज्योनियोक्त था । कालिकापुराणमें लिखा है, कि सुमतिके पुत्र | चयिशेप । इस चक्र अनुसार नामोचारण करनेसे कला और पत्र 'विजय । विजयने माहो| जय पराजयको उपलब्धि होती है। नामोधारणका क्रम कर प्रबल प्रतापसे पार्थियों को परास्त किया। भारतीय इस प्रकार है-भ्यास प्रवेशकालमें लग्नसहक वर्ण संगी राय उनके हा माये। पोछे इन्द्र के मादेशसे | (प, फ, ग, म, म, य, मा, ६ई, उ, ऊ, प्र. घर. ल. या इन्होंने मो योजनविस्तृत खाएडययन प्रस्तुत किया। परे, मो, मी) या स्वरके साथ घोपस शायर्ण (ग, घ, सो पनको अग्निको तृप्तिके लिये अर्जुनने जलाया था । ज, झ, भ ,४,ण , म, म) का नाम उन्धारण विष्णुफे एक अनुबरका नाम । (कालिकापुराया ह०)| करनेसे जय और भ्यासनिर्गमकालमें अलग्नसशकपर्ण - १० घुञ्च के एक पुनका नाम । ११ जयके एक ( य, प, र, ल,. ) तथा अधोपम शायर्ण (कन, पुत्र का नाम । १२ सयफे एक पुत्र का नाम । १३. म, छाट, ठ, ताप, प, फाश, प, म)का नाम उभारण । अपदयके एक पुत्र का नाम । १४ भान्ध्रयंशीय एक करने से परामा होती है। (गरपतिजपचर्यास्वरोदय) रामा: १५ सिहलमें भायंसभ्यताप्रयक एक राज. विजयचूर्ण (मलो०) मर्श रोगका कमोपय प्रस्तुत कुमार | बिसि देखो१६ शम मुहर्राभेद । १७/ प्रणालो-सोंठ, पोपल, काली मिर्च, भामल की, ययक्षार, साठ संवत्सरमें पहला संवत्सर। १८ भोजन करना, हरिद्रा, दामहरिदा, ना, चिरायता, पद्रपय, मिताका मूल, खामा । ११ एक महारका धन्दा: या पेशव अनु। यितबन्द, सोयाँ, पञ्चलपण, पोपलमूल, चेलसोट मोर .सार सधे येका मत्तगयद मामक मेन है। । यमानी इन सब प्योको मच्छी तरह चूर्ण कर समान