पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३७१

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- विजय प्रशस्ति-विजय मित्र ३१५ • किया करते हैं। सभी मनुष्य अपनी अपनी अवस्था प्रस्तुत प्रणाली-पारा, गन्धक, लोहा, विष, प्रवरक, अनुसार पूजाका भायोजन करते हैं। जो धनी हैं, ये | हरिताल, विड़ा. मोथा, इलायचो, पोपलमूल, नागेश्वर, प्रतिमूर्सि यगा कर वाचवा पटमें चित्रित कर देवी सौंठ, पीपल, कालीमिर्च, आमलकी, हरीतकी, यहड़ा, पूजा करते हैं। प्रायः सभी जनसाधारण बपड़े को , चितामूल, गोधित जयपालवीज, प्ररपेक द्रव्यका वर्ण पीठ पर चित्रित माताको पूजा किया करते हैं। जो | एक एक ताला तथा गुह दो तोला, रहें एकस मिला कर हो, इस दिन प्रामाणसे ले कर चण्डाल पर्यन्त लोकमाता अच्छी तरद महम करे। पांछे इमलीको गुठली के समान की भाराधना लिपे ध्यान रहते हैं, इसमें जरा मो मादेह । इमकी एक एक गोली प्रति दिन प्रातःकाल में सेवन नहीं। पूनाके दिन गृहकर्ता वा कत्रको सारा दिन करनेसे कास, श्वास, अजीर्ण और अध्याग्य रोग जाते निरम्यु.उपवासके . वाद पूजाके भन्तमें नारियलका जल रहते हैं। · पोर जागरण और घ तोडादिमें सारी रात वितानी २ कुष्ठरोगको एक औषध। प्रस्तुत प्रणालो-उद्य पहतो है । पोंकि, ऐसो प्रसिद्धि है, कि उस दिन रातको पातित यन्त्रमें सप्त दोपनिमुक्त पारेको मन्त्रपूत कर लक्ष्मोगे कहा था,-('नारिफेलाल पीत्वा को जागर्शि, मिट्टी कडाईम तथा कुष्माण्डके रस या तेलादिके साथ महोतले' ) 'नास्पिलका जल पो कर आज कौन जगा दोलायन्ता सात वार परिशोधित पारेसे दूनी दरसाल हुमा है। मैं उसे धनरता दूंगी' धनाध्यक्ष कुधरने भी नया कयत्त मुस्तका, रस मार झिण्टाक रसफा युक्ति उसी दिन उक्त अवस्था रद कर पूना की थी । लक्ष्मीने | पूर्वक दे कर.पारे और हरतालसे दूनो पलासको मम्म उस दिन ऐसा कहा था सिकारण उस दिनको दोजा. ये। अनन्तर झिएटीके रममें सबको हुपा कर पोम्त गर' और उस दिनको लक्ष्मीनाको 'कोजागरी लक्ष्मी के रस पुनः उमे.बाप्लुन करे। पीछे पड़ो सावधानी. पूमा कहते हैं। पूजा तथा अन्यान्य मत नियमादिका विवरण से शालको लाडोकी मनमे धोयोम पहर तक पार कोजागर शम्दमें देखो। करे। ठण्डा होने पर कारफे वरतन में उसे रख छोड़े। पिमयप्रशस्ति (स' रसी०) कयि श्रीदरचित खण्डकाव्यः | मधु और जल, नारियल, जिङ्गिनांपवाप प्रा मधु मोर मेव. इसमें राजा विजयसेनका कीर्रािफलाप पर्णित है। मोथे रस करोष चार रत्तोसे ले कर प्रति पिजयभाग (सपु०) १ जयांश । २जयलाम । । दिन एक एक रत्ती करके बढ़ाये । इममें यातरक्त, नाम, रिजरभैरयतेल ( स. क्लो०) भामयामरोगमें स्पा सब प्रकारफे कुछ, अम्लपित्त, विस्फोट, मसूरिका और पपवतेल । . प्रस्तुत प्रणाली--पारा, गन्धक, मेनसिल प्रदर रोग न होते हैं। इसमें मछलो, मांस, दही, साग, और दरिताल प्रत्पेक द्रव्य २ तोला ले कर कांजी में पीसे । खट्टा मार लालमिर्का खाना मना है। पीछे उससे एक माह सूक्ष्म. परन लिप्त कर दे। जब विजयमन्दिरंगढ़-राजपूतानाफे भग्तपुर सपान्तर्गत एक पद सूरा जाय, राव मोकी तरह जाये। इसके बाद | प्राचीन गढ़। यहां भरतपुरफ पुराने राजे घास करते उम वसोको तेलात करके उमदं निम्न भागमें एक पात्र थे। आज कल यह विस्तोर्ण बसायशेष परिणत हो गया। रखकर ऊध्यभागको प्रज्वलित करे तथा यहां क्रमशः पत्तोक .निाशेष न हो जाने तक फिर घारे धीरे सेल विजयमल (सं० पु.) विजयाय मला दणा, प्रागीर कारका एक प्रकारका हाल। येता रहे। यह नेल पकने पर नीचे के. बरनामें रपक विजयमल (सं० पु० ) TREET नाम । कर जमा हो जायेगा । इस लकी मालिश करने से प्रबल राजतर० ७/१२) घेदना, पकाया नया पाहुकम्प आदि विविध बालरोगविजयमाली (सां. पु.) एक यणिकका नाश ! प्रशमित होते हैं। पह नेल पके साथ ३५४ विन्दुमाता-! ( कया3० ७२३२८४). · में मो पान किया जाता है।..... . विजयमित (सं.)मनाधिपति व सामन्तरासका पिसपभैरवरस (सं० .) १ कासरोगहो पा गौरव । नाम : ( रामवर० १३६६)