पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३७२

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जियनन्दन-विजयामा सपमे म नगरम गरिदर्शन लिये गये धे! गको गन्धाफे माय गन्छो तरद पोटे और कमलों म घरनाको स्मृतिम रिपेयी एक मारकी प्रतिष्ठा पीछे उम कालीको एक लोहे के पेमें रखकर दुई। रामा गियराम गतानि दिये एप टाउनहाल | लाहीको भाग पर रख दे। जा या मन् और मापा Taniग मट्टालिकामोंमे नगरको गोगा जाग, तब गोबरले लिपे हुए एक मेले में पते.पाहा। बढ़ रही है। मन्दाज में देशोय पैदल सैम्पमा एप पेमा करनेसे यह पर्पटाकार अर्थात पाटन दल रो माया करता है। यहां गाजेता धर्मयाजा दोगा। उसोको विजयरपंटो करते है। प्रापा, . (Chaptain) रहने हैं, उनको मासमें दो बार रविवारीको फुध, अर्श, शोथ मोर मतांण रोगां इसका nirm. विलोचन पौर निकाकोल ब्रमण करना पड़ता है। जाता है। व्यवहारका निमम प्रहार -RRA यह स्थान पाया है। दो रत्ती इस पपेटोका सुपारोके गलो साप संवारना इस गगामें एशियाले है, जिसका कुलमर्म होता है। पाछे दिन प्रति दिन पहरा यार राजदरबारम मिलता है। जिस दिन धारह रत्तो पुरो हो जापेगो, उम मरे ग.. यिम पनन (सपु. ) यावंगोय राजविशेष . . से फिर प्रति दिन एक परता घरामो होगा। इस पर्शय-जर। औषधका दिनसे चौथे दरार में सेवन करना होता है। 'यिनपगाप-प्रहमायापार नामक ज्योतिर्गम्य रय.. पोछे भयस्थानुसार दिन ३४ पार करके सुपारो पालो. "यिता । फे माय सेयन कर सकते हैं। पध्यापटपकी im- विजयनारायणम्-मन्दाजादेश में तिग्नेयलो जिलान्तर्गत | भोपच सेयन तीसरे दिनमे मांसका जूम मौरत: मानगुणेरी तालुकका एकनगर। यह नानगुणेरो मदर- दुग्धादि व्ययम्धेय है। काले रंगको मछली, 'जलमा से ५ कोस दक्षिण-पूर्म अपस्थित है। . . . . यिायपफरण्य ( तेल या.जिस किसी तरह दोगुना हा पिजयन्त (म.पु.) इन्द्र। पदार्थ), फेला, मलो, तेल और नेल को यधारो हुई सरकारी यिजयन्ती (सं० प्रा० ) प्रायोगा । (येदिक निप०.) । भादि सामा मना है। स्रोसम्भोग मौर दियागितामा विनयपपिएस-पहभापा एक सर्घप्रथम महामारत- | यजगीय है। (रसेन्द्रधारस. पारोग.) .' मनुवादक तथा सददेशके एक प्रापीन कपि। विजय विजयपाल (स.पु.) १ एक प्राचीन संस्त कषि। ६. पण्डितका मारत तात्पर्यानुयाद 'पितयपाएएयका नाम. राजान विजयपाल नामसे प्रसिद्ध थे । २ कामोरे मप्रमिद्ध है। एक राजा! भाप १०१६ मम्मत् वियमान थे। विजयपता ( पी०) १ सेनाको यह पताका जो पराकान्त मादेलराजमो १०३० मौजूद थे। शीतपे. समय फहराई जाती है। २ विजयसूचक कोई ! - चन्द्राय देतो। चिदा . . . विजयपुर (सं .) गरिमापति प्रोगस विजयी (मरती) प्रती रोगको एक भोपघ। मार्ग एक प्राचीन मगर । विमपनगर देखो। प्रस्तुन प्रणाली-२ तोले पारेको जपलीके पत्ते, दो गिजयपूर्णिमा ( स० ) यिगादगमोके मूल, गदरक और कामागोकं रम द्वारा भानु परनेवालो finा. पाशिमको पूर्णिमा । पूर्णिमा भायमा देकर पशुिम करे। पोछे २ तोला मामलमा हिन्दमावदीय उमादसे लामाको पना की। गरपाले पर कुछ चूर्ण कर भौर पी गजामा पनि म गृहस्पतिवार या रिसोम दुधोका कमी पूर्ण सुधा ले । तीन बार म AIIT को समाप्त करने का विधान है गौर होई. तु. सुमने दार उमे मग्निमें दयीमत पर पड़ी नेशांग मार परतो कि पूना मो काले देगा मालामा बागकामे लाम। प्रम. दार उस पार जरित देरने उन पूर्णिमा हिना को गो, मो काग. • गय मौर तन मस्कदो तोला मिलाकर उकासको माना गोदिन सनमनमादिगा .