पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३७४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१४ जियनन्दन-विजयामि . . . ' र म नगर परिदर्शनफे नि गरे थे। उनको गन्धा मा मच्यो तरद पोटे पर 3 घरनाम्मृति लिप व एक नारको प्रतिष्ठा पीछे उमली को एक लोहे से हो रहा ' निराम गति दिये तुप टाउनाल, लकड़ोको साग पर रख दे। मा पर माया , भार मादाय र प्रमालिकाममि नगरको गोमा | जाप, तव गोवरमे रिपे हुए एक फैले के पत्ते.पर शानदे। बह रही। गदाज, देगोर बाल सैया प. एक ऐमा करनेसे यह पर्पसकार गर्धान पाटनदार दस भाप करता है। यहां के गाजे जा धर्मयाजा होगा। उसोको विजयारा कहते हैं। प्राली पर, (Chitpihin) रही है, उनको मासमें दो बार विधारोको | कुछ, मर्श, गाय मोर सता रोगमें इसका Useri विमोत्ता मी पिकाकोलम्रमण करना पड़ता है। जाता है। व्यवहारका निमम प्रकार -प्रति पर पान यम बाप। दो रत्तो इस पपेटोका सुपारोके जल सायन परता म मगामें एशियालेज है, जिसका कुल होता है। पांछे दिन प्रति दिन पाएका राहदरवार से मिलता है। जिस दिन वारद रना पूरी हो जायेगो, उम मरेल. विजयनगर ( पु.) याकूयंशोष राजविशेष · । से फिर प्रति दिन पक पक रत. घरानो होगो । । पर्याप-जप। आपका दिन चौथे भएट में मंयम करना होता है। विजयनाप-प्रमायापाय नामक ज्योतिफेरब.. पोछे भयस्थानुमार दिन में ३४ मार कर सुपारोके पानी

  • यिता।

फे माय सेयन कर सकते है। पपापको मा- पियनारायणम्-मद्रामप्रवेश तिग्नयलो जिलान्तर्गत मापध संयन के तीसरे दिनसे मामका जूम भोर पर मानगुरो तालुकमा एक नगर । यह मामगुणेरो मदर. दुग्धादि प्ययम्धेय है. काले रंगको ममो, जसमा से५ कोम दक्षिण-पूयम मयस्थित है। विदग्धपत्रव्य (मेट या जिम किसी तरहदो गुना हा पिजपत (60पु0) इन्द्र। पदार्थ), फेला, मूली, मेल और होलको यधारा int पिजयन्ती (म० रमा० ) मालोनाक । (येदिक निप०.) । आदि ग्वाना मना है। प्रोसम्मोग मोर दियामि भी मियपरित-पदमापाफे पर सर्वप्रथम महामारत. पजनीय है। (रसेन्द्रसार योगेग.) . . भनुपादक तथा सददेश पफ मापीन कपि। विजय विजयपाल (म.पु०) १५क प्राचीन मंटन कोय। पएिडतका भारत-सात्पर्यानुवाद 'विजयपाएज्यका माम मामक विजयपाल गामसे प्रसिदथे । २ मा में प्रसिद्ध है। एक राजामाप १०१६ मम्म विद्यमाग धे। विजयपता (सं० मी.) १ सेनाकी यह पताका जो रास नदेलो १०३०६० मारा : जोतो. ममप कराई जाती है। २ विजपएचक कोई - चन्द्राय in till विजापुर (मो .) मविपप्राध्यमित योग विजयपटो (मो .) प्रहलो रोगको एक सौषध न प प्राचीन मगर अपनगर देखो। " प्रम्न प्रपाली-२ तोले पारेको जपतोय. पत्ते, दो जिपपूर्णिमा (स. सी०) विजयादशमोर मूल, गदरक भार काममानो रम द्वारा भानु परनेवाली पूर्णिमा, माशिमकी पूर्णिमा पूर्णिमाम मामा देकर परिशुत करे। पोछे २ गोला मलमा ग्नुिमाया तो उत्माहस MAINो करते। गन्धर कुछ चूर्ण कर मोरनाराज रमा पनि प्रति AIR पनि पामोimlgh को सुधा में। मोत पार RRER दिनो ममोmaratiधिग मौrsit. नु...' गुणाने. दार उगे मनियोग पर वो ने मार परे मामा करने पर घinin. पारोह का मकबार आपार जति कुदेरले उन कोगी, मी का • राय मोर प्रस्मेक को नोमा मिला. मी मामांकि ममममममापी