पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४०३

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विज्ञान ३३३ पृहदारण्यको -"य एष विज्ञानमयः" (२।१।१५) "योऽयं गोतामें "राजस ज्ञान" पद भी 'विज्ञान' शब्दके यदलेमे विश नमयः पुरुषः।" | व्यवहन हुआ है, जैसे- तैत्तिरीयमें "पोपे मारमा विज्ञानमय" (२४१) ___- "पृथक त्वेन तु यशानं नानाभावान पृथग्विधान ! "कर्माणि विज्ञानमयञ्च भात्मा" (मुण्डुकमें ३३२७) वेचि सर्व पु मतेष तज शानं विद्धि राजसम् ॥" (२०१८) “यस्तु विज्ञानवान् भवति" (कठ ३१६) भगवद्गोतामें विधान शब्द प्राय: सभी जगह ज्ञान ... "एहि विज्ञानात्मा पुरुषाप" (प्रश्नोप०४६) भादके साथ व्यवहृत हुआ है। जैसे-'ज्ञानविज्ञान इन सा स्थलीमे कहीं विशिष्ट शान, कहों ब्रह्मशान, | तृप्तात्मा" "ज्ञान विज्ञामसहितम्" "ज्ञान विज्ञानमास्ति कहीं श्रवणमनननिदिध्यासनादिपूर्णक उपनिषद् ज्ञान- काम्" इत्यादि । श्रीमद्भागवतमें भी इन दोनोंका एकत्र अर्थमे विज्ञान शब्दका प्रयोग हुगा है। सग्निवेश देखा जाता है, जैसे- __श्रीमद्भगवद्गीताफे टीकाकारों ने इस प्राब्दके अनेक "ज्ञानं परमगुह्यञ्च य द्वज्ञानममन्वितम् ।" ___ अर्थ लगाये हैं। श्रीमद्भगवद्गीता अध्यायके ४२३ (२य स्कन्ध । अ०) लोकको 'ज्ञान विज्ञानमास्तिर" इत्यादि लेकिको टोका इन सप स्थानोंमें रामानुजाचार्यको ध्यास्या हो बहुत

  • में श्रीधरस्वामोने "विज्ञानमनुमया" ऐसा अर्थ लगाया कुछ सङ्गत है अर्थात् ज्ञान शब्द का अर्थ भगवद्विपरक

है। रामानुतने लिखा है, "परतस्वगतामाधारणवि.प. ज्ञान तथा विज्ञान शब्दका अर्थ निखिल इन्द्रियार्थविषयक विषय-विज्ञानम्"; शङ्करानार्याने लिखा है, "विज्ञान, विगिट ज्ञान है-जैवशान भी इसके अन्तर्गत है निखिल कर्मकाण्डे 'फयाकोशल', ब्रह्मकाण्डे ग्रह्मात्मैवानुभयः।" इन्द्रिमा घषयक विशिष्ट ज्ञान हो माधुनिक विज्ञानका 'मधुसूदन सरम्बतोने शङ्कराचार्यको ध्याण्याको हो ठोक | विषय है। कोमने (Comte ) दहन हैं- पतलाया है। फिर दूसरी जगह पक्षानुभव हो विज्ञान | We have now to proceed to the exposition शरके अर्धमें प्रयुक्त हुआ है। of the system; that is to the determination of अगरेजों में जिमे Science कहने हैं, सांस्कृत में उमौका! the universal or e:cyclopaedic order which नाम निशाना सामोनोवा must regulate the different classes of natural जैसे पदार्श-विज्ञान, रसायनविज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, phenomena and consequently the correspon ज्योतिर्घिद्वान, जीवविज्ञान, द्भिगिज्ञान इत्यादि । श्री. ding positive sciences. मद्भगवद्गीताका वा अध्याय पढ़ने में मालूम होता है, कि श्रीमद्भगवद्गाताफे इस ज्ञानविज्ञान नामक अध्यायमें पाश्चात्य भाषामे जिम श्रेणीके ज्ञानको Sciencess समग्र विश्वतस्य विज्ञानके साथ विश्वेश्वरके ज्ञानका . हैं, श्रामगवद्गीतामें उसी. श्रेणोके ज्ञानको विज्ञान कहा | आभास दिया गया है। विश्व विज्ञानको मूलस्वरूपिणो । महाशक्तिको कथा इस अध्यायमें उल्लिवित हुई है। इस ' सुविख्यात फ्रांसीसी दार्शनिक पण्डित कामतेने ! अध्यायमै प्रमाणित किया गया है, कि समान विश्वप्रपञ्च (Comte) Inorganic तथा Organic Science'या' एफ अक्षय महाशक्तिका भिन्न भिन्न प्रकाशमान है। द्वारा जो सभी विज्ञान अनर्मुक्त किये हैं, श्रीभगवद्गीता-... इससे सावित होता है, कि सब प्रकार के प्रापश्चिा ' में भी उन सबका समावेश है। उसमें ध्योम-विधान पदार्थमें ही भगवत्शक्ति मोतप्रोतभायमें विद्यमान है। भू विक्षाम है, वायवीय विज्ञान, उभिदु-विधान, ज्योति प्रापश्चिक पदार्थसमूह जो उस अदृश्य शक्तिको सत्त्या पर विज्ञान, जीवविज्ञान तथा उनके अन्तभुक्त निखिलविज्ञान हा विद्यमान है, हायट स्पेनसर भो यही भावात्मक वात विषय पक्षित हुए हैं । अतएव श्रीमद्भगवद्गीता कहते हैं, जैसे- .. में व्यवहत विज्ञान शब्द पाश्चात्यविज्ञानके Science | Every Phenomenon vis a manifestation of शब्दके प्रतिनिधिरूपमे ध्यपहत हो सकता है। भगव- 1. force, . :: .. ..:. ' Vol. Xx7. 84,