पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४१०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३४० ... — विड़-विदङ्ग प्रयाद, कि प्रधाने शष्टिकार्य समाप्त करके यहां । येतोशाक, रेडीमूलकी छाल, पीसघोपा, कदलीकन्द, पुन एक हाध्यमेधयाका अनुष्ठान किया। यह-समाप्तिके बाद | नया, सदसको छाल, पलाशकी छाल, होजलयोग, निल, उनकी पादुकासे एक कोटरा इस जगह गिरा और सोपान ! स्वर्णमाक्षिक, मूलक, शाकका फल, फूल, मूग, पत्र मार , पर गद गपा । तीर्थयात्री इस जगह बा कर उस फाटकी काण्ड तथा तिलनाल, इन सव द्रव्योंको अलग अलग पूजा करते हैं। प्रति वर्ष कात्तिको पूर्णिमाको यहां एड करे। पीछे कुछ पीस फर शिलाताल वा पपरमे बड़ी धूमधामसे एक मेला लगता है। किसी शिसी वर्ष । इस प्रकार दग्ध करे, जिसमें क्षार अपरिष्टत न हो तिथिफे विपर्ययके कारण यह मेला अगहन मासमें ! जाये। बादमें येतो शाकसे मूल शाकके काएर तक लगता है। पन्द्रह प्रकारके क्षार तथा तिलनालके क्षार इन सब सयोध्याफे नयाय गाजी उदोन हैदरफे मन्त्री राजा | क्षारोको समान भागोंमें ले कर मूतवर्ग, अर्थात् दायो, टोकापेत् रायने बहुत रुपये खर्च कर यह घाट तथा उसके | ऊंट, घोड़े, गदहे, भेस, गाय, बकरी गौर मेढ़े इन गाउ अगर घर बनगा दिया है। अन्तिम पेशवा बाजीराव यहां | प्रकार. जन्तुओंफे मूत्र में अच्छी तरह भालोहित. परे। गिर्वासित हो कर गाये थे। नगरमें उनका प्रासाद कुछ समय याद जब वह स्थिर हो जाय, तप ऊपरफ. आज भी विद्यमान है। उनके दत्तकपुत्र नाना साहयकी | मूत्ररूप निर्मल जलको साफ बारीक कपड़े में छान उत्तेजनासे कानपुर विद्रोहमें खड़ा हुआ! ले। अनन्तर किसी लोहेये. वरतनमें उसे रख धीरे धीरे नाना साहस देखो। | आंच । जब उसमेसे घुबुद्ध और याप्प निकलना १८५७ ई०को १९यों जुलाईको गगरेज सेनापति | दिखाई दे अर्थात् बद गच्छी तरह ग्रोल रहा है ऐसा हायलकने इस स्थानको दल किया । उसके भाफमण- मालूम दे, तब होराकसोस, सौरानतिका, यवक्षार,, से वाजोरायका महल चूरचूर हो गया तथा नागा साहय ! साचीक्षार, सुहागा, सौंठ, पीपल, मिर्च, गन्धक, चीनी, भाग चले । पहले यहां बहुत लोगोंका वास था । स्थानीय होंग भोर छ: प्रकारफे लयण, इन सब द्रोंका चूर्ण गदालत पहांसे उठ जाने पर उनको संख्या बहुत घट | समान भागमें ले फर उक्त क्षारसमएिका चतुर्थाश गई है। किन्तु ग्रामों की संख्या पूर्ववत् है। अधिकांश | उस खोलने हुप जलमें डाल दे। 'पा शेर होने माह्मण ग्रामतोफे पण्डा है। तीर्थस्थानके उपलक्ष | पर अर्थात् जलका तिहाई गाग शेप हो जाने पर यहां बहुमसे यालो जाते हैं । इस नगर के पास हो गढ़ाको | उसे उतार किसो कठिन यरतनमें भर मुहबद कर दे एक नदर यह गई है। शहर में एक प्राइमरी स्कूल है। मोर सात दिन तक जमोमफे अन्दर छोड़ दे। गाउ विड़ ( सं० लो०) विक। १ लवणयिशेप, सांवर दिनमें यह पक क्षारजल मारणादि कार्यमें उपयदार करणे. नमक। पर्याय-विष्ट गग्ध, काललयण, विद लवण, | के लायक होगा। उलाखत मक्षपणीय द्रव्याफ, म के लायक होगा। उलिखित प्रक्षेपणीय द्रव्योफ अन्तर्गत द्राषिड़क, सएड, एतक, क्षार, भामुर, सुपापप, एड. सुहागेको पलाशपृक्षको छालवे, रसगै सो धार भापना लपण, पूर्स, कृतिमक। गुण-उष्ण, दीपन, निकर दे, पीछे उसे मुसा कर चूर्ण कर ले। घात, अजीर्ण, माल, गुन्म और मेहनाशक । (राजनि० ) | चिगन्ध । स० पलो० ) पिट्लयण सागर मगर। . .. भावप्रकाशके मतसे-जदय कफ तथा अधोवायु- (शनि०) का अनुलोमकारक, दीपम, लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, श, सति | पिडा (म' पु. पली०) गिद्ध आमाश (विटादिम्या पित् । कपाध्ययायो, वियाय, मानाह, यिएम्भकारक गोल उप १११२० ) इति च स चकित ! (liniclin । मा । (भार० ). ribes, cerls cal Embelits riles) भ्यनाममपास भीषध, विटा याविटंग । ( राजनि०) वायविडंग। तेल-पायुविधपुस । म्या-पर्यदि पिड(म.पु.) रगतारण गिमित्त प्ययहाय्यं क्षार आयट, कार्य:गंना । मामिल-विलपाय-येल्ल, 4. विशेषां इमको प्रस्तुत प्रणाली इस प्रकार है-- मोया, चित्रतपदुम्ला, तण्डुल, फिलिम, रसायन, पाया,