पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४१७

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वितनित-वितस्ता २४७ वितनित ( स०नि०) चितनोति वि तन्- तृच । विस्ता- , वितपर्य (स० लि.) घि-सर्फ यत्। १ वितणीय, रक, फैलानेवाला। . जिसमें किसी प्रकार के वितर्क या संदेहका स्थान हो। वितनु (स. त्रि०) १ तनुरहित । २ अति सूक्ष्म । | २ अत्याश्चर्यरूपसे दर्शनीय, जो देखने में बहुत विलक्षण वितम्यत् ( स० नि०) पितनोति वि-तन् शत् । विस्तार हो। कारक। | विततुर (स' फ्लो०) परस्परव्यतिहार द्वारा तरण, चितन्तसाव्य (स'० वि०) १ विशेषरूपसे विस्तार्य, | धार वार जाना । (भूषा १११०२।२) स्तोल द्वारा वन्दनीय । २ शत्रुओं का हिसका वितहि (सनी ) वि.सई हिसाया ( सर्वधातुभ्य इन् । वितपन्न (हि. पु०) १ वह जो किसी काम कुशल हो, | उगा ।।११७) इति इन् । वैदिका, वेदो, मंच। घ्यूहाम्न, पक्ष। (वि०)२ घबराया हुआ, प्याकुल । | विताह का ( स०सी०) वितहि रेव स्वाथै फन् टाप् । चितमस ( स० वि०) विगतस्तमो यस्य । १ तमोगुण- वेदिका, दो। • रहित । २ अन्धकारदीन । | वितहों ( स० स्त्री० ) वितदि-कृदिकारादिति हो । वितमस्क (स० वि०) दिगतस्तमो यस्मात् , कप समा- दी। . सान्तः। १ अन्धकारहीन,, जिसमें अन्धकार न हो। धितों ( स० सी० ) वेदो। २ तमोगुणरहित। | वितल ( स० पली. ) विशेपेण तल'। सात पातालो. विनर ( स० पु० ) शि-तृ-अप्। १ विनरण, देना । (नि.) मेंसे तीसरा पाताल । देयोभागवतके अनुसार यही २ विष्ट, दूर किया हुआ ! ३.विशिष्टनर । ४ अत्यन्त, दुसरा पाताल है। कहते हैं, कि यह पाताल भून्द के अतिशय। अधोदेशमैं अधिष्ठित है। सर्वदेवपूजित भगवान् भवानी- वितरक ( वि.) वितरण करनेवाला, वारनेवाला। पति हाटकेश्वर नामसे अपने पार्षदों के साथ इस पानाल. वितरण (सी०) वि.तृ भावे युद।। .१ दान करना, में रहते हैं। प्रजापति ब्राह्माको सृष्टि विशेषमासे सम्बद्र- मर्पण करना, देना। २ वाटना। नार्थ भूतनाथ भवानी के साथ मिथुनीभूत हो रयां वितरणाचार्य (स० पु०) एक प्राचार्याका नाम । विराज करते हैं। इनके वीर्यसे वाटकी नामकी नदी · वितरम् (स अध्य.) वितर देखो। वहती है जिसे हुताशन वायुके साहाय्य से ज्वलित हो विताम् (स' अध्य० ) भौर भी, इसके अलाया। कर पीते हैं। यह पान करनेके समय इनके मुह. (शतपथना० १।४।१।२३) | से जब फुफकार निकलता है, तब उससे हाटकं नामक वितरित (स' नि०) जो वितरण किया गया हो, बारा सोना निकलता है। यह दैत्योंका बड़ा प्रिय है। दैत्य " हुभा। | रमणियां उस सोनेसे अलङ्कार आदि घना कर यहे यत्न- वितर्क (सं० पु. ) वि-तर्क-अत्र । १ एक तर्क के उपरान्त से उसे पहनती हैं । पाताल शब्द देखो। होनेवाला दूसरा तर्क । २ सन्देह, संशय, शक । ३ अनु. वितलिन (सं० पु.) वितललोकको धारण करनेवाले, मान। ४ ज्ञानसूचक ! ५ अर्थालङ्कारविशेष। सन्देह या पलदेव ।। - वितर्क होने पर यह अलंकार होता है। यह निश्चयान्त वितस्त (स त्रि०) पि-तसक्त। १ उपक्षीण | "चैतस और अनिश्चयान्तभेदसे दो प्रकारका है। जहां सन्देह वितस्तं भवति ।" (निवक्त ३।२१) २ वितस्ति देखो। , निश्चय होता है, वहां निश्चयान्त वितर्क तथा अहाँ वितस्तदत्त ( स० पुं० ) वितस्ता दत्ता, संज्ञायां-हस्व (पा निणीत नहीं होता, वहां शनिश्चयान्त वितर्क होता है। । ६०६३) । मौद्ध पणिभेद । (कथासरित्सा० २०१५) वित्तफण (सं० क्लो०) वितर्क ल्युट् । वितर्कः। वितस्ता (सं० बी० ) पक्षावके अन्तर्गत नदीविशेष | इसे वितर्कवत् ( स०सि०) वितक विद्यतेऽस्य वितक मतुप् 'याज कल झेलम् कहते हैं। यह नदी वेदवर्णित पञ्चनदी । - मस्य च । वितर्क युक्त, वितर्क विशिष्ट । . . . . | में एक है । ऋग्वेदके १०म मण्डल में इसका परिचय है।