पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४२१

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विदारीकन्द-विदुर ३५५ कहते हैं । यह रोग लिदोषसे उत्पन्न होता है तथा इसमें विदाहक (स. त्रि०) विदाह-स्वार्थे कन् । १ जो तिदोषके समो लक्षण दिखाई देते हैं। | विदाह उत्पन्न करता हो। २ विदाह देखो। इसकी चिकित्सा- इस रोगमैं पहले जोक द्वारा रक्त | यिदाहयत् ( स० वि०) विदाहो विद्यतेऽस्य मतुप् मध्य मोक्षण करना उचित है । इसके पक जाने पर शस्त्र । विदाहयुक्त, जिसमें ज्याला वा जलन हो । प्रगोग करके प्रणरोगको तरह चिकित्सा करनी चाहिये। विदाहिन् ( स० क्ली० ) विदहतीति वि.दह-णिनि । (भावप्र० सुदरोगाधि०) / १ दाहजनक द्रव्य, यह पदार्थ जिससे जलन पैदा हो । प्रयाद है कि इसके पकफे निकलनेसे लगातार (त्रि०) २ दाहजनक । फुसियां निकल जाती है। विदिकचङ्ग (स.पु०) हरिदार पक्षी। ५ कर्णरोगभेद । (याभट उ० १७५०) प्रमेह विदित ( सत्रि०) विद्-क्त। १ अवगत, ज्ञात, जाना रोगकी एक पीड़का या फुसी। (सुभ्र त नि० ६ ५०) हुआ। २ मधित। ३ उपगम। विदित ज्ञानमस्या- ७ सुवर्चला 1 ८ वाराहीकन्द । क्षीरक कोली । १० स्तीति अर्श आदित्याच । (पु.) ४ कवि। ५जाना. यामटोक्त गणविशेष । परएडमूल, मेषशृङ्गो, श्वेत- श्रय । पुनर्नवा, देवदारु, मुगानी, मापाणी, फेवाच, जोषक, विदिथ (सं० पु०) १ पण्डित, विद्वान् । २ योगी। शालपान, पिठवन, हतो, पएटकारी, गोक्षुर, अनन्त विदिश (सं० स्त्रोक) दिग्भ्यां घिगता। दो दिशाओंके मूल और हंसपदो इन्हें विदार्यादिगण कहते हैं । गुण- वीचका कोना । जैसे-भग्नि या ईशान आदि । पर्याय- हृदयका हितजनक, पुष्टिकारक. वातपित्तनाशक तथा शोप, अपदिश, प्रदिशा कोण। गुल्म, गात्रवेदना, ऊर्ध्वश्वास और कासमरामक। विदिशा (सं० स्त्री०) १ पुराणानुसार पारिपात्र पर्वतपाद (वाग भट स० स्था०१५) से निकली हुई एक नदीका नाम। (मार्क-पु. ५२० । विदारीकन्द (संपु०) विदारो, भुई कुम्हड़ा। २ वर्तमान भिलसा नगरका प्राचीन नाम । भिन्नता दला। बिदारीगन्धा : स० स्रो०) घिदार्या भूमिकुष्माण्डस्पेय | |विदोगय (सं० पु० ) पक्षांविशेष, सफेद वगला । गन्यो यस्याः । १ शालपणी । २ मुश्रुतके अनुमार शाल. (त्ति० स०५।२२।१) पर्णी, भुई कुम्हड़ा, गोखरू, विजधन्द, गोपवल्ली, पिठवन, विदीधयु (सं०वि०) १ विलम्य, देर। २ दीप्तिशून्य, शतमूली, अनन्तमूल, जीवन्तो, मुगबन, यहती, कटकारी, आभाहीन। पुनर्नया, परएडमूल आदि गोपधियोंका एक गण । इस विदीधिति (सं०नि०) विगता दीधितया किरणानि यस्य । गणको सा ओषधियां घायु तथा पित्तकी नाशक और निर्मयत, किरणहीन । शोध, गुल्म, ऊर्ध्वश्वास तथा खांसी आदि रोगांमें विदीपक (सं० पु० ) प्रदीपक, दीमा.। .हितकरमानी जाती है। घिदारोगन्धिका (सं० स्त्री०) विदारीगन्धा। | घिदोर्ण (सं०नि०) विद्वत । १ वोचसे फाड़ा. या घिदा. विदारीद्रय (स० पु०) कुष्माण्ड और भूमिकुष्माण्ड, रण किया हुमा । २ मग्न, टूटा हुमा । ३ हत, मार डाला . हुआ। . .. .. कुम्हसा गौर भुकुम्हड़ा। (वैद्यकनिः) विदु (सं० पु.) त्ति संझामनेनेति विद-बाहुलकात् घिदार (स.पु०) कपाद, फकलास, गिरगिट ।। विदासिन् ( नि.)दस्य उपक्षधे वि-वस-णिनि । कु। १-हाथोके मस्तकके बीचका भाग। २ घोडे.के काम- उपक्षययुक्त। । के नोचेको भाग! . . विदाह (मपु०) पिदह-यम । १ पित्तके प्रकोपसे | विदुत्तम (सं० पु०) पिदां-ज्ञानिना उत्तमः 1. १.सर्वश, होनेवाली जलन । २हाथ पैर में किसी कारणंसे होनेवाली यह जो सव बातें जानता हो। २ विष्णुका एक नाम । जलन। पिदुर (शं. नि०) पेरित शोलमप विदफरष (दि.