पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४२६

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विदुर–विदुष्टर : निरत रह कर सुखसे समय विताते हैं, किन्तु डागाध- वृष्टिरही, खेती विलकुल होने न पाई, घरमै वीज तक न रह बुद्धि विदुर अनाहार रह कर अभियचमांवशिष्ट हो घोर गया। यह देख विदुरको बड़ी चिन्ता हुई, कि विना सपस्या कर रहे हैं। ब्राह्मणगण कभी कभी इस कानन- मनके फैष्णवको सेवा किस प्रकार होगी? भगवान उनकी के पति निर्जन प्रदेशमें उनके दर्शन पाते हैं ।" वैष्णव-सेवाके प्रति ऐकान्तिकता देख उन पर धड़े. प्रसन्न दोनों में इस प्रकार बातें चल रही थी कि इसी समय! हुए तथा रात्रिको उन्हें स्वप्न दिया कि, 'विदुर! 'तुम मलदिग्धाङ्ग जटाधारी दिगम्बर महात्मा विदुर उस प्रसन्न हो कर खेत चारो करो, आवश्यकतानुसार अवश्य आश्रमके समीप ही दिखाई दिये। किन्तु वे एक बार फसल उत्पन्न होगी, तुम्हारी चैष्णव सेवामें जरा भी भाश्रमका दर्शन करके ही हठात् लौट गये । धर्मपरायण | विघ्न न होगा।" प्रातःकाल होने पर विदुरने वैसा ही युधिष्ठिर उनके पीछे पीछे दौड़े। महात्मा विदुर क्रमशः | किया जैसा रातको स्वप्नमें कहा गया था। निविड़ अरण्य में प्रवेश करने लगे । यह देख फर धर्मराज | थोड़े ही समयमें आशातीत शस्य उत्पन्न ने करुण स्वरसे चिल्ला कर कहा, 'हे महात्मन् ! मैं आपका हुआ। उनके घरमें प्रचुर शस्यको आमदनी होने लगी। प्रिय युधिष्ठिर है। आपके दर्शन करने आया है। यह देख उन्होंने ईश्वरको आन्तरिक धन्यवाद दे अपनेको करुण स्वर सुन कर विदुर उसी विजन विपिनमें एक धन्यधन्य समझा। गृक्ष पकड़ कर खड़े रह गये । धर्मराजने अस्थि- | विदुरता (सं० स्त्रो०) विदुरका भाघ। धर्मावशिष्ट महात्माके समीप जा कर फिर कहा, | विदुल (स० पु० ) विशेपेण दोलयतीति वि.दुलक । "प्रभो ! में आपका प्रियतम युधिष्ठिर, मापसे साक्षात् १ चेतस, चेत। २ अम्लधेतस, अगलत । ३ वोल या करने आया है।" इस पर विदुरने कुछ भी उत्तर न दिया, गंधरस नामक गन्धद्रव्य । केवल एक द्दष्टिसे धर्मराजकी ओर देखने लगे तथा योग | विदुला (स' स्त्रो०) १ एक प्रकारका हर। इसे सातला वलसे युधिष्ठिरकी दरिमें दूष्टि, गावमें गान, प्राणमें प्राण, | भो कहते हैं। २ विट खदिर। इन्द्रियमें इन्द्रिय संयोजित कर उनके शरीरमें प्रविष्ट | विदुला-महाराज सौवीरकी महाराणीका नाम। यह हुए । उस समय उनका शरीर कठपुतलोको तरह । वोरवाला तथा गुणवती थी। इसके स्वामीको मृत्यु स्तब्ध और विचेतन हो उसी वृक्ष पर लटक रहा। अभी होने पर सिन्धुराजने इसके राज्य पर आक्रमण किया था। . धर्मराज युधिष्ठिर अपनेको पहलेसे अधिक बलशाली | प्रयल शत्रुके गाक्रमणसे इसका पुत्र सञ्जय धड़ा भीत समझने लगे तथा वेदव्यासकथित अपना पुराना हुमागा। परन्तु माता विदुलाके उत्साहसे उत्साहित वृत्तान्त उन्हें स्मरण होने लगा। अनन्तर वे जय विदुर- | हो कर सजयने युद्ध किया और अपने पिताफे राज्यका उद्धार किया पटेश प्रत्येक सत्पुत्र कह- के शरीरको दग्ध करने तय्यार हुए, तब आकाशवाणी | हुई कि, "महाराज ! महात्मा विदुरने यतिधर्म प्राप्त किया लानेके अभिलापियोंको सर्वदा स्मरण रखना नाहिये। है, मतपय माप उनका शरीर दग्ध न करें, ये सन्तानिक (महाभारत) नामक लोक प्राप्त कर सकेगे, इसलिये भाप उनको । विदुप (सं० पु०) विद्वान्, पण्डित। लिये कुछ शोक भी न करें।" धर्मपरायण युधिष्ठिर इस | विदुषो (स' स्त्री०) वेत्तीति विदेः शतुर्वसुः उदिगश्येति- प्रकार देवपाणी सुन फर विदुरका शरीर न जला कर डीप। विद्वान् स्त्री, पढ़ी हुई स्त्री। अधिराजके माधममें लौट आपे। विदुपोतरा ( स० खी०) अयमनयोरतिशयेन विदुपी, विदुर-एक वैष्णवभक्त। यह निकाममाय सर्घदा वैष्णवः विटुपी-तरप्। दो स्त्रियों में से जो अधिक पण्डिता हो । सेवामे निरत रह कर जैतारण.ग्राममें रहते थे। वैष्णव- विदुष्कृत (स नि० ) निष्पाप । (कौशि० उप० ११४ ) के प्रति एकान्त रति रहने के कारण भगवान् विष्णु इन पर विदुष्टर (स० वि०) विद्वस्तरप् । विद्वत्तर, दो बड़े प्रसन्न हुए थे। किसी समय वहुत दिनों तक अना- विद्वानों से जो. श्रेष्ठ हो। . . . :: पद