पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४२८

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३६९. विदेह-विदेहकैवल्य (लि०) ५ कायशून्य, जो शरीरसे रहित हो । (भागवत | सादृश्य है। संस्कार है, चिचा अधिकार है, यह मलित ३।१०।२६) ६ पाटकौशिक देहशून्य, जिनके माता-1 का बन्धन है, इसीलिये भाष्यकारने 'कल्यपदमिय' । पितृज पाटकौपिक शरीर न हो । देवताओं को विदेह कहा | इस शब्दका व्यवहार किया है । इस शब्दसे किसी जाता है। पातालदर्शनमें लिखा है-"भवप्रत्ययो विदेह- किसी कामें भेद और किसी कामें अभेद समदा प्रकृतिलयानां ।" ( पातजातसू० १११६) . जायेगा। जो आत्मासे भिन्न अर्थात् जो आत्मा नहीं हैं। ____ भोग और अपवर्ग ये छोनों, चित्तके अधिकार है। उनको यर्थात् भूत, इन्दिय और प्रकृतिको भात्मरूप में आत्मतत्र साक्षात्कार होने दीसे अपवर्ग होता है। आसना करते है उन्हें विदेह या देवता कहते हैं। इन अतएव जब तक चित्त आत्मतत्त्व साक्षात्कार न कर सोको समाधि भवप्रत्यय अर्थात् अविद्यामूलक है। सके, तब तक चाहे जिस किसी भस्थामें क्यों न रहे, वे लोग जो सिद्धिलाभ करते हैं, उसके मूठमें अविदया। अवश्य लौट आना पड़ेगा। विदेह यो प्रकृतिलयाकी' रहती है। उसका समूल छेद या नाश नहीं होता । इसका मुक्तिको म्वर्गावशेष कदा जा सकता है। क्योंकि, इसीसे तात्पर्य यह कि निराध समाधि दो प्रकारको है, श्राद्धादि प्रच्युति है । परन्तु कालका न्यूनातिरेक मात्र है। स्वर्ग- उपायजन्य और भज्ञानमूलक। इनमें से उपाय जन्य कालसे अधिककाल सायुज्यादि मुक्ति रहती है तथा समाधि योगियों के लिये होती है। विवह अर्थात् माता. आत्मज्ञान लाभ कर निर्वाणमुक्तिलाभको भी सम्भावना पितृज देहरहित देवतामोको भवप्रत्यय ( अज्ञानमूलक) है। चाहे जितना भी क्यों न हो, उक्त सभी अज्ञान समाधि होती है। यह विदेह देवगण केवल सांस्कार- मूलक है अर्थात् अनात्माको आत्मा जानना उसके सभ विशिष्ट चित्तयुक्त (इम चित्तमें किसी प्रकारको पृत्ति स्थलोंमें है। इस कारण भगवान् शङ्कराचार्यने इस गोय. नहीं रहती, चित्तका हांस्कार होने के कारण उसकी वृत्तियाँ मुक्तिके प्रति जरा भी विश्वास न किया। . . . तिरोहित हुई है, शतपय यह नित्त दग्ध योजभाष होनेसे विदेवादिका मुक्तिकाल-विषयं ब्रह्माण्डपुराणमें इस संस्कृत हुआ है ) हो कर मानो फैयल्य पदका अनुभव प्रकार लिखा है- . . करते करते इसी प्रकार अपने संस्कार अर्थात् धर्मके न्द्रियोपासकोका मुक्तिकाल दश मन्वन्तर, सूक्ष्म परिणामको गौणमुक्ति अवस्थामें बिताते हैं। भूतोपासकोका सौ मन्यन्तर, अहङ्कारापासकोंका हजार चौबीस जड़तत्यके उपासकोंको ही घिदेह और | मन्यन्तर, घुद्धि उपासकोंका दश हजार तथा प्रकृति प्रकृति-लय कहा है । केवल विकार अर्थात् पञ्चमहाभूत उपासकोंका मुक्तिकाल लाख मन्वन्तर है। ७१ दिव्य. और एकादश इन्द्रिय इन सोलह पदार्थोमें से किसी एक युगका एक पक मन्यन्तर होता है। निर्गुण पुरुपको को मात्मा समझ उसकी उपासना कर जो सिद्धिलाभ पानेसे अर्थात् आत्मशान लाभ करनेसे कालपरिमाण करते हैं उन्होंको विदेह कहते हैं। नहीं रहता, तब फिर उन्हें लौटना नहीं पड़ता। । प्रकृति शम्दसे 'फेवल मूल प्रकृति और प्रकृति-विकृति | .. आश्चर्यका विषय है, कि विदेदोका चिस इस दीर्घ- (महत् अहङ्कार और पञ्च-तम्मान ) समझी जायेगी। काल प्रकृति, सम्पूर्ण लीन रह कर भी पुना एक्त मुक्तिके - उक्त भृत, इन्द्रिय और प्रकृति के उपासक सिद्धिलाम करके वाद ठीक पूर्वरूपको धारण करता है। लयके पहले मुक्तकी तरह मयस्थान करते हैं । भाष्यमें "प्रकृतिलोने चित्त जैसा था, लपके बाद भी ठीक पैसा ही होता है। धैकल्यपदमिधाभवन्ति" प्रकृतिलीन विदेशोंका जो कैवल्य . . . (पातखलद.) कहां है, उस कैवल्य शब्दसे निर्वाणमुक्तिन समझी | विदेहक (सं० पु०) १. पुराणानुसार एक पर्वतका नाम। जायेगी, गीणमुक्ति अर्थात् सायुज्य, सालोक्य और सा. | २एक घर्षका नाम । (शत्रु अयमा० ११२९२) मोप्य समझा जापेगा। इन मुक्त विदेशके स्थूल शरीर | विदेहकूट-जैन पुराणानुसार एक पर्वतका नाम। ". नहीं है, चित्तकी वृत्ति भी नहीं है, यह मुक्तिका विदेहकैवल्य (सक्को०) विदेह फेयल्य कर्मधा० । निर्वाण