पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४२९

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निदेहत्व-विद्या ३६१ मोक्ष। जीवन्मुक्तके देहायमानके बाद जो निर्वाणमोक्ष विद्धि (मं० स्रो०) ध्यध-ति ( महिन्यावयिव्यधिवष्टिक्चिति- लाभ होता है, उसे विदेहकैल्य कहते हैं। उसके प्राण | पृश्वसि पृच्छतिभृजतीनों डिति च इति सम्प्रसारणम् । पा उत्कान्त नहीं होते हैं, इस जगह लीन हो जाते हैं । अर्थात् ६१।१६) आघात करना, मारना । उसके मोक्ष लाम होता है । भोग द्वारा प्रारब्ध कौका क्षय विद्मन् (सं० क्लो०) विद्यन इति विद्-मनि (भावे)। होनेसे जीवन्मुक्त व्यक्तिके वर्तमान शरीर पतन होनेके | १ज्ञान । २ मोक्षार्थ शान, परमार्थ-ज्ञान । दाद जो निर्वाणमाक्ष लाभ होता है, उसे असंप्रज्ञात विझनापस् ( स० त्रि०) ज्ञान द्वारा व्याप्त या शातकर्मा, ममाधि कहते हैं। . जो सब कमों से अवगत हो। विदेहत्य ( स० लो०) १ विदेह होनेका भाव या धर्म। विद्यमान (स. त्रि०) विद-शानन् । वर्तमान, उपस्थित, २ मृत्यु, मौत, भरोका नाश। . . मौजूद। विवेहपति- एक प्राचीन थायुर्वेदविद् । वागभटने इन विद्यमानता ( स० स्त्रो०) विद्यमान होनेका भाष, उप- का उल्लेख किया है। २ विदेह नामक स्थान के अधिपति.! स्थिति, मजिदगी। जनका . विद्यमानत्र ( स० लो०) विद्यमानस्य भाव त्य । विद्य. विदेहपुर (स० लो०) राजा जनककी राजधानी,जनकपुर। | मान होनेका भाव, उपस्थिति मौजूदगी । मान हानका भाव, उपास्यात विदेहा ( स० स्त्रो०) मिथिला नगरी भौर उस प्रदेशका विद्या ( स० स्त्री०) विद्यतेऽसौ इति विद संज्ञायाम् क्यप, नाम। स्त्रियां टाप। १ दुर्गा । (शब्दरत्ना० ) २ गणिकारिका विदेदिन ( स० पु. ) ब्रह्म । गनियारो। ३ज्ञान अर्थात् मोक्ष विषयमै बुद्धि । "मोक्षे धोनिम्" (अमर) विदोष (सं० त्रि०) दोपरहित, जिसमें किप्तो प्रकारका जिसके द्वारा परमपुरुषार्थका साधन होता है उसका दोष न हो, वेऐव। विदाह (सं० पु० ) विशेषरूपसे देाहन । नाम विद्या है । यह विद्या ब्रह्मज्ञानस्वरूपा है । एकमात्र घिद्ध (मं० वि०) विध्यते स्मेति व्यक्त। १ छिद्रित, । ग्रहाशाम ही पुस्पार्थसाधन है। विद्या द्वारा इस पुरुषार्थ- योधसे छेद लिया हुआ | २क्षिप्त, फेका हुआ। का साधन होता है, इसीसे इसको ब्रह्मज्ञानरूपा कहा है। ४ विद्याहेतु शास्त्र। यह अठारह प्रकारका है । छः ३ सदृश, समान, तुल्य । ४ बाधित, जिसमें वाधा पड़ी हो। ५ ताडित, याहत, जिसकी चोट लगो हो। अङ्ग (शिक्षा, कला, व्याकरण, छन्द, ज्योतिष और नियक्त) ६प्रेरित, भेजा हुआ | ७ यक, टेढ़ा । (पु०) ८ सनिगात । चार वेद (सान, क, यजुः और अथर्व), मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र और पुराण ये चौदह तथा भायुर्वेद, धनुर्वेद, (क्लो)सयोव्रणविशेष। गान्धर्वशास्त्र और अर्थशास्त्र, यहो मठारह विधा है। विद्धक (सं० पु० ) मृत्तिकामेदकारी यन्त्रविशेष, प्राचीन ____ मनु कहते हैं, कि नोचसे भी उत्तमा विद्या प्रहण को काला एक प्रकारका यन्त जिससे मिट्टी खोदी जाती जा सकती है। थी। . ____ "श्रद्दधानः शुर्मा विद्यामाददातावरादपि । विद्धकर्ण (स.पु.) अफवनादि। ' अन्त्यादपि परं धर्म स्त्रीरन दुष्क लादपि ॥". विद्धत्व (सं० लो०) विद्धका भाव या धर्म । .. . . (मनु २ म०) विद्धपर्को ( स० स्रो० ) गुल्मभेद (Pongamia. :पुराणमें लिखा है, कि जो बाल्यकालमे विद्याध्ययन globra) । नहीं करते, घे इस जगत्में पशुकी तरह विचरण करते विमल ( ) यह सूजन जो शरीरके किसी संगमें है। जो माता पिता अपने बालकको विदयाध्ययन नही कटिको नोकके चुगने या टूट कर रह जाने-सी होती है। कराते, वे शलस्वरूप हैं। इसमें गला जिस प्रकार शोमा विद्धा ( स० स्त्री०) एक प्रकारका शुद्ररोग जिससे नहीं पाता, उसी प्रकार विद्याहीन मनुष्य इस जगत्में नहीं शरीरमें बहुत छोटो छोटो फुसियां निकलती हैं। ! शोभता। . . Fol, IXI. 91,