पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४३२

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३६४ विधा उन्हें मधुमांसभोजन, गाण्यानुलेपन, माल्यादि धारण, , प्रातःकालमें मेधका गर्जन होनेसे उस दिन भी शास्त्रको गुड़ आदि रस प्रहण तथा स्त्रोसम्भोग न करना नाहिये। चिन्ता न करे; करनेसे आयु, विद्या, यश और पलको. जो सब वस्तु स्वाभाविक मधुर हैं, किन्तु किसी कारण- हानि होती है। . . से अम्ल हो गई हैं तथा दधि मादिका भोजन उनके लिपे माघ, फाल्गुन, चैत्र और वैशाख इन चार महीनों में निषिद्ध है। प्राणीहिंसा, तैल द्वारा ममस्त सर्वाङ्ग | यदि मेघ गर्जन हो, तो पाठ वन्द कर देना होता है। प्रति. अभ्अन, कजलादि द्वारा चक्ष रजन, पादुका वा छत्र. पद और अष्टमी तिथि, त्रयोदशी और चतुर्दशोको रात्रि धारण, काम, क्रोध, लोभ तथा नृत्य, गोत और वादन, | तथा अमावस्या और पूर्णिमा तिथिमें पाठ निपर है। साक्षादिफोड़ा, पृथा कलह, देशवादिका अन्येपण, | पे सप तिथियाँ अनध्याय कहलाती हैं। मिथ्या कथन, कुत्सित अभिप्रायसे स्त्रियों के प्रति दृएि जितने प्रकार के दान हैं उनमें विद्यादान सपिशा और दूसरेका अनिष्टाचरण, विद्यार्थी ब्रह्मचारीको इन | श्रेष्ठ है। कन्या और जलाशय दागर्म तथा राजसूयादि सबसे अलग रहना चाहिये। यशमें जो फल होता है विद्यादान उससे भी अधिक सभी ब्रह्मचारीको सर्वत्र एक साथ सोना चाहिये। फलंप्रद है। एकमात्र विद्यादानकै प्रभावसे शिवलोक- हस्त संञ्चालन द्वार। रेतःपात करना उचित नहीं और | की गति होती है। . . कामवशतः रेतःपात करनेसे आत्मवत बिलकुल नए हो देवीपुराणके विद्यादान नामक महाभाग्य-फला. जाता है । यहां तक, कि यदि अकामतः ब्रह्मचारीके | ध्यायमें विशेष विवरण भाया है। विस्तार हो जाने के स्वप्नादि अयस्थाम रेतास्खलन हो जाय, तो उन्हें उसी भयस यहां कुल नहीं लिखा गया। सभी धर्मशास्त्रोने समय स्नान कर सूर्यदेवको अचेंना कर लेनी चाहिये तथा एक स्वरसे स्वीकार किया है, कि विद्यादान सभी दाना- 'पुनर्मामेतु इन्द्रियं' अर्थात् मेरा योयं पुन: लौट आये, | | में श्रेष्ठ है। इत्यादि वेदमन्त्र तीन चार जपने चाहिये। जल, पुष्प, हेमाद्रिके व्रतखएडमें लिखा है-जिन सव समिध, कुश गादि जो कुछ गुरुको प्रयोजन हो उन्हें ला विद्याओं का विवरण ऊपर दिया गया उनमस देना शिष्यका कर्तव्य है। गुरुके लिये प्रति दिन भीख | प्रत्येक विद्याके एक एफ अधिष्ठात्री देवता है । मांग कर लाना भी शिष्यका पक कर्तव्य कहा है। ऋग्वेदके अधिष्ठात्री देवता ब्रह्मा, यजुर्वेदके पासब, साम• शिष्य इस प्रकार कठोर ब्रह्मचर्याका अवलम्बन कर वेदके विष्णु, अथर्चचेदके महादेव, शिक्षा के प्रजापति, गुरुस विद्याध्ययन करे । यदि वेदविद् ब्राह्मण गुरु न | कल्पके ब्रह्मा, प्याकरणके सरस्वती, निरुतके वरुण, मिलते हों, तो श्रद्धायुक्त हो कर दूसरे व्यक्तिसे भी | 'छन्दके विष्णु, ज्योतिपके रवि, मीमांसा चन्द्र, न्यायके श्रेयस्करी विद्या लाभ कर सकते हैं । स्त्री, रत्न, विद्या, वाय, धर्मशास्त्र के मनु, इतिहासके प्रजाध्यक्ष, धनुर्वेदके धर्म, शौच, हिताचन तथा शिल्पकार्य सयोंसे सभी इन्द्र, आयुर्वेदके धन्वन्तरि, कलावियाको महोदेयो, लाभ कर सकते या सोख सकते हैं। ब्राह्मण ब्रह्मचारी | नृत्यशास्त्र के महादेव, पञ्चरात्र के सङ्कर्षण, पाशुपतके सर, आपदुकालमें अत्राह्मण अर्थात् ब्राह्मण भिन्न दूसरे वर्णसे | 'पातालकं अनन्त, सांख्यके कपिल, अर्थशास्त्रके धना- यदि विद्याभ्यास करे, तो कोई छोपनहीं। उतने दिनों और कलाशास्त्र कामदेव हैं। इस प्रकार सभा 'तक पादप्रक्षालन गौर उच्छिए भोजनादि भिन्न उन्हें शास्त्रोंके अधिष्ठात्री देवता हैं। भनुगमनादि द्वारा गुरुको सुश्रुषा करनी होगी। ' 'ध्रुतिमें विद्याके दो भेद बतलाये हैं, पराविद्या और .जा शिष्य गुरुको कायमनोवापसे प्रसन्न रखता अपराविद्या। "यया ब्रह्मायगमः सपरा, ययाक्षरमधिगम्य है, उसके प्रति विद्या प्रसन्न रहती हैं । विद्या प्रसन्न | सा परा।" (धति) जिस पियासे ब्रह्मज्ञान होता है, उसक होनेसे सर्व सम्पद लाभ होतो है। . . . नाम पराघिदया है। ब्रह्मविद्या ही परायिया है । क्योंकि अनध्यायके दिन विद्याशिक्षा नहीं करनी चाहिये। ब्रह्मविद्या चा ब्रह्मशान होनेसे ससारनिवृत्ति होती है या